Wednesday, June 1, 2011

डरी हुई है हमारी सरकार


अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट खालिस्तान लिबरेशन फोर्स का आतंकवादी देविंदर पाल सिंह भुल्लर की दया याचिका राष्ट्रपति द्वारा खारिज किए जाने के बाद अब कुछ लोगों द्वारा उसकी सजा को आजीवन कारावास में बदलने की मांग की जा रही है। इस संदर्भ में पहली बात यह है कि कानूनी तौर पर इस मांग में कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि ऐसा किया जाना संभव है। परंतु सवाल यह है कि मानवता के दुश्मन ऐसे खूंखार अपराधियों को इतने लंबे समय तक बिना सजा दिए आखिर रखा ही क्यों जाता है? यदि हम देविंदर पाल भुल्लर की ही बात करें तो तकरीबन 20 वर्ष से ज्यादा हो गए उसे जेल में बंद किए, लेकिन उसकी दया याचिका मामले में निर्णय होने में ही कई साल लग गए। मेरा मानना है कि फांसी की सजा पाए अपराधियों के मामले में ज्यादा से ज्यादा चार या छह माह के भीतर अंतिम निर्णय ले लिया जाना चाहिए। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि मौत की सजा पाए व्यक्ति का हर दिन तिल-तिलकर मरने वाली होती है। ऐसे मामलों में न केवल वह व्यक्ति पीडि़त व परेशान होता है, बल्कि उसका समूचा परिवार, सगे-संबंधी व अन्य लोग भी मानसिक यंत्रणा के दौर से गुजरते हैं, जिनका अपराधी के अपराध से कोई लेना-देना भी नहीं होता। इसी तरह अफजल गुरु का मामला भी है, जिस पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सकता। सरकार भले ही इसके लिए बहाने दे कि फाइल अभी उसके पास नहीं पहुंची है, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई से पूरे देश की जनता भलीभांति अवगत है। सरकार जानबूझकर ऐसे मामलों को लटकाकर रखती है ताकि उनका राजनीतिक फायदा लिया जा सके। अभी तक यही कहा जाता है कि न्यायपालिका से न्याय मिलने में काफी वक्त लगता है और इस प्रवृत्ति को जल्द से जल्द दूर करने की आवश्यकता है, लेकिन राष्ट्रद्रोह के मामलों में सजा पाए देशद्रोहियों के मामले लटकाकर रखने से साफ है कि ऐसा प्रशासनिक मशीनरी और राजनीतिक मशीनरी द्वारा भी किया जाता है। इसलिए सुधार की आवश्यकता सभी क्षेत्रों में है ताकि देश के लोगों का विश्वास न केवल न्याय व न्यायपालिका में बना रहे, बल्कि देश के समूचे तंत्र में विश्वास बने। राष्ट्रपति के पास इस तरह के कुल 28 मामले लंबित पड़ें हैं, जिन पर फैसले का इंतजार पूरे देश को है। राजीव गांधी के हत्यारों को भी अभी तक सजा नहीं दी जा सकी है। इसके लिए कुछ लोगों का तर्क है कि जब तक पहले के लोगों को सजा नहीं दे दी जाती तब तक अफजल, देविंदर या दूसरे देशद्रोहियों को भी सजा देना संभव नहीं है। कानूनी रूप से ऐसा कुछ भी जरूरी नहीं है, हां यह अवश्य है कि पारदर्शिता, निष्पक्षता और न्याय के तकाजे के मुताबिक ऐसा किया जाना चाहिए। परंतु इसका यह मतलब नहीं कि क्रमबद्धता के नियम से क्रमश: फांसी दी जाए। इस बारे में सबके अपने तर्क हो सकते हैं। अभी तक मुंबई हमले में पकड़े गए आरोपी कसाब का सजा नहीं दी जा सकी है और उस पर करोड़ों रूपया उसकी सुरक्षा के नाम पर खर्च किया जा चुका है। आखिर इस सबकी क्या जरूरत है? इससे तो देश की जनता का मनोबल और विश्वास टूटता है व देश के कानून व्यवस्था पर से आस्था डिगती है। अब समय आ गया है जबकि सरकार इस पूरे मामले पर गंभीरता से विचार करे और दोषियों को एक निश्चित समयसीमा के भीतर सजा दिलाने के लिए कोई ठोस प्रारूप व दिशानिर्देश तय करे। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि फांसी की सजा पाए अपराधी कई बार इतने लंबे समय तक जेल की सजा काट चुके होते हैं जितना कि आजीवन कारावास की स्थिति में होता है। इसलिए इस व्यावहारिक पहलू को ध्यान में रखा जाए कि न्याय सिर्फ मिले ही नहीं, बल्कि ऐसा होते हुए दूसरे लोगों को भी दिखे ताकि अपराध व ऐसे अपराधियों को साफ संदेश मिले और रोकथाम में मदद मिले। इन देशद्रोहियों को देरी से सजा देने के पीछे सरकार का यह डर भी है कि इससे देश के भीतर हालात बिगड़ सकते हैं और उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ सकता है। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका पाकिस्तान के दोषी होने के बावजूद उसे उसी की धरती पर पाक साफ बताने की नीति अपना रहा है। ऐसे में हमें विचार करना होगा कि कब तक हम अमेरिका के इशारे पर काम करते रहेंगे। यदि आतंकवादियों को सजा देने में हम विफल रहते हैं तो उनका आत्मविश्वास मजबूत होगा और इस तरह के हमले बार-बार करने के लिए वह प्रोत्साहित होंगे।

क्यों नहीं दी जा रही आतंकियों को फांसी


खालिस्तान लिबरेशन फोर्स का खूंखार आतंकी देविंदर पाल सिंह भुल्लर की दया याचिका राष्ट्रपति द्वारा खारिज किए जाने के बाद उसकी मौत की सजा माफ करने को लेकर एक बार फिर राजनीतिक पाखंडियों ने अपना छाती धुननी शुरू कर दिया है। राजनीतिक दलों द्वारा भुल्लर को माफी देने के लिए कोहराम मचाना इस बात का संकेत है कि राजनीतिक दल अपने सियासी फायदे के लिए किसी भी हद तक गिरने को तैयार बैठे हैं। पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भुल्लर की सजा को आजीवन कारावास में बदलने की वकालत की है वहीं शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और सत्तारूढ़ अकाली दल द्वारा भुल्लर की सजा के मामले में प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने की मांग की गई है। देखा जाए तो इस तरह का राजनीतिक प्रपंच और मानसिक दिवालियापन सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि महज कुछ दिनों में होने वाल पंजाब विधानसभा चुनाव में लाभ उठाया जा सके। यह बहुत विचित्र लगता है कि ये दोनों ही राजनीतिक दल वाहे गुरु के सुझाए रास्ते पर चलने की बात करते हैं और राष्ट्रद्रोहियों के आगे न झुकने की गाल भी बजाते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का तनिक भी ज्ञान नहीं है कि वे जिस आतंकी के गुनाहों को माफ करने की राजनीतिक धमा-चौकड़ी मचाए हुए हैं वह कोई साधारण अपराधी नहीं, बल्कि दुर्दात आतंकी और देशद्रोही है और उसने सैकड़ों बेगुनाहों का खून बहाया है। उसके अपराध की गंभीरता को देखकर ही देश के सबसे बड़े न्यायालय ने फांसी की सजा मुकर्रर की है। राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भी उसकी क्षमादान याचिका खारिज कर चुकी हैं। राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज किए जाने के बाद भारतीय संविधान में मौत की सजा पाए किसी अपराधी को अपने बचाव के लिए कोई रास्ता नहीं बचता है। यह जानने के बावजूद भी अगर राजनीतिक दल देविंदर पाल सिंह की माफी की आड़ में जनमानस की भावनाओं को उभारकर सियासी फायदा समेटने का जुगाड़ बांध रहे हैं तो यह उनकी कायराना सियासत ही समझी जाएगी। आतंकी भुल्लर का अपराध कोई सामान्य श्रेणी का नहीं है और न ही वह कोई इंकलाबी मसीहा है जो उसके पक्ष में आवाज बुलंद की जा रही है। उस पर पंजाब के पूर्व एसएसपी सुमेंध सिंह सैनी और पूर्व युवक कांग्रेस अध्यक्ष एमएस बिट्टा के खिलाफ आतंकी हमले की साजिश रचने का आरोप है। सियासी मानवतावादियों को ध्यान रखना चाहिए कि इस हमले में कई निर्दोष लोगों की जानें भी जा चुकी हैं। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि दया याचिकर्ताओं को न्यायालय द्वारा उचित प्रक्रिया अपनाकर ही मौत की सजा सुनाई जाती है। ऐसा नहीं है कि न्यायालय किसी आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने का भरपूर मौका नहीं देता है। अगर देविंदर पाल सिंह भुल्लर न्यायालय में अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर पाया तो इसके लिए उसका देशद्रोहात्मक कृत्य ही जिम्मेदार है। यह सब जानने के बाद भी अगर सियासतदानों द्वारा दिखावटी तरीके से भुल्लर को माफ करने की गुहार लगाई जा रही है तो उन्हें यह बताना ही होगा कि जिन निर्दोष लोगों के खून बहाने का अपराध भुल्लर ने किया है आखिर उसका हिसाब कौन देगा? इस दुर्दात खालिस्तानी आतंकी को 2001 में फांसी की सजा सुनाई गई थी और इसने 14 जनवरी, 2003 को राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका पेश की, लेकिन त्रासदी यह है कि भुल्लर की दया याचिका 27 अन्य याचिकाओं के साथ नार्थ ब्लाक में लंबे समय तक धूल फांकती रही। मामला तब तूल पकड़ा जब भुल्लर ने मानसिक अवसाद से पीडि़त होने की गुहार लगाकर सुप्रीम कोर्ट से क्षमादान याचिका पर जल्द सुनवाई के लिए दरख्वास्त लगाई। असाधारण बिलंब से दुखी होकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि मृत्युदंड या आजीवन कारावास प्राप्त अपराधियों की दया याचिकाओं पर फैसला करने में इतना विलंब क्यों हो रहा है? संप्रग सरकार के पास फिलहाल इस प्रश्न का कोई सार्थक जवाब देते नहीं सूझ रहा है। देश के गृहमंत्री को यह ज्ञान बांटते हुए सुना गया कि वर्तमान नियमों में दया याचिकाओं पर निर्णय लेने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। गृहमंत्री से पूछा जाना चाहिए कि इस तरह की जुगाली आखिर कितने दिन तक चलेगी। अगर समय सीमा निर्धारित नहीं है तो सरकार क्यों नहीं कानून बनाकर समय सीमा निर्धारित कर रही है? क्या इसके लिए भी किसी और के सिर ठीकरा फोड़ने की तैयारी की जा रही है। जिस व्यक्ति को फांसी की सजा मुकर्रर हो और उसके बचाव के सारे रास्ते भी बंद हो चुके हों, ऐसी स्थिति में उस आरोपी को हर रोज मरना पड़ता है जो फांसी से भी बदतर है। इसे जायज नहीं ठहराया जा सकता है। इस बारे में यह भी उचित नहीं है कि अपनी सियासत की गणित सुधारने के लिए ऐसे लोगों को दीर्घकाल तक मौत के जबड़े में फंसाए रखा जाए। माना कि ऐसे दुर्दात अपराधियों के प्रति किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं होनी चाहिए और न ही वे इसके हकदार हैं, लेकिन इस बात का ध्यान तो रखना ही चाहिए कि उन आरोपियों के परिजनों पर क्या गुजरती-बीतती होगी। देखने में यही आ रहा है केंद्र की संप्रग सरकार ने दया याचिकाओं को राजनीति के भंवर में फंसा रखा है और स्वार्थपूर्ण राजनीति कर रही है। अगर ऐसे में देश के राजनीतिक दल और तमाम सामाजिक संगठन फांसी की सजा पाए आरोपियों को तत्काल फांसी देने की मांग करते हैं तो इसे अनुचित कैसे कहा जा सकता है? कांग्रेस के अतिरिक्त सभी राजनीतिक दल और पूरा देश चाहता है कि संसद भवन को निशाना बनाने वाले आतंकी अफजल गुरु को जल्द से जल्द फांसी हो जिसे सरकार द्वारा अनसुना किया जा रहा है। गौरतलब है कि अफजल गुरु को 20 अक्टूबर, 2006 को फांसी की सजा दी जानी थी पर उसकी पत्नी द्वारा दया याचिका दाखिल किए जाने के बाद मामला खटाई में पड़ गया। कांग्रेस के लोग दलील दे रहे हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में तीन लोगों की सजा संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु के मामले से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। सवाल यह नहीं है कि अफजल गुरु अथवा राजीव गांधी के हत्यारों में से किसे फांसी पहले दी जाए और किसे बाद में, बल्कि सरकार की नीति और नियत की है। संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि किसी देशद्रोही को फांसी देने के लिए क्रमबद्धता को आधार बनाया जाए, लेकिन आतंकवाद से लड़ने का कोरा बहाना गांठने वाले गृहमंत्री क्रमबद्धता की ही पूंछ पकड़े बैठे हैं। सच तो है कि केंद्र सरकार अफजल मामले में सियासत की आग सुलगाकर उस पर सियासी रोटी सेंकना चाहती है। संप्रग सरकार 2004 से ही सत्ता में है और अब तक उसे सात साल से ऊपर होने जा रहा है, लेकिन किसी की भी समझ से परे है कि वह अभी तक एक भी लंबित दया याचिकाओं पर कोई निर्णय क्यों नहीं ले सकी है। अगर इसके पीछे कोई ठोस तर्क नहीं है तो मतलब साफ है कि सरकार दया याचिकाओं पर विचार करने से डर रही है। सत्ता में बैठे कुछ लोग यह प्रचारित करने में भी जुटे हैं कि अगर अफजल गुरु को फांसी दी गई तो घाटी में एक बार फिर उबाल आ जाएगा। पाकिस्तान से रिश्ते खराब हो जाएंगे। बातचीत पटरी से उतर जाएगी और न जाने कौन-कौन-सी बला आ जाएगी। कुछ ऐसा ही कुतर्क अकाली दल और पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह जैसे लोग भुल्लर की फांसी पर भी दे सकते हैं। इस तरह के विचारों को पोषने वालों से पूछा जाना चाहिए कि वे इस तरह की परोक्ष धमकी भरा कुतर्क देकर आखिर किसको डराने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वाकई में संप्रग सरकार आतंकियों को सबक सिखाना चाहती है तो उसे बिना देर किए दया याचिकाओं पर तत्काल निर्णय लेना चाहिए और क्रमबद्धता के तर्क को खूंटी पर टांगकर भुल्लर और अफजल जैसे आतंकियों को फांसी की शूली पर चढ़ा देना चाहिए। इन देशद्रोहियों की फांसी देने से सरकार और देश की कानून व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ेगा। अन्यथा यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि सरकार आतंकवाद पर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


लोकपाल पर धोखाधड़ी


लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने वाली समिति के बीच यकायक उभरे मतभेद यदि कुछ स्पष्ट कर रहे हैं तो यही कि केंद्र सरकार के इरादे नेक नहीं हैं। इस समिति में शामिल सरकारी पक्ष जिस तरह इस पर जोर दे रहा है कि न तो प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए, न सांसदों के संसद में किए गए आचरण को और न ही वरिष्ठ नौकरशाहों को उससे तो ऐसा लगता है कि देश के साथ या तो छल किया जा रहा है या फिर भद्दा मजाक? ध्यान रहे कि लोकपाल से न्यायाधीशों को बाहर रखने की दलील इस आधार पर पहले से ही दी जा रही है कि उनके लिए न्यायिक जवाबदेही विधेयक लाया जा रहा है। तथ्य यह है कि यह आश्वासन संप्रग सरकार के पिछले कार्यकाल से दिया जा रहा है और बावजूद इसके हाल-फिलहाल इस विधेयक के पारित होने के आसार उतने ही दुर्बल हैं जितने दो वर्ष पहले थे। यदि केंद्र सरकार को केवल चंद कनिष्ठ अधिकारियों को ही लोकपाल के दायरे में लाना है और वह भी सीबीआइ को स्वायत्तता दिए गए बगैर तो फिर बेहतर होगा कि सरकार लोकपाल व्यवस्था के निर्माण के संदर्भ में झूठी दिलासा न दे। कागजी शेर सरीखे लोकपाल का कहीं कोई मूल्य-महत्व नहीं। इस पर गौर किया जाना चाहिए कि यह वही सरकार है जिसने अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद देश को यह समझाने की कोशिश की थी वह भ्रष्टाचार से लड़ने और इसके लिए एक सक्षम लोकपाल बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। आखिर इस प्रतिबद्धता का लोप क्यों हो गया? क्या इसलिए कि सरकार की ऐसी कोई मंशा ही नहीं थी? अब तो इस पर भी संदेह हो रहा है कि केंद्र सरकार ने अन्ना हजारे और उनके साथियों के साथ लोकपाल विधेयक का मसौदा बनाने की पहल उनके आंदोलन को निष्प्रभावी बनाने और जनता का ध्यान बंटाने के लिए ही की थी। यह निकृष्ट राजनीति का एक और नमूना ही है कि जो सरकार कल तक सक्षम लोकपाल बनाने पर सहमति दिखा रही थी वह यकायक इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों को चिट्ठी लिखकर यह पूछने जा रही है कि क्या प्रधानमंत्री, शीर्ष न्यायपालिका और संसद के भीतर सांसदों के कार्यो को लोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए? आखिर यह कार्य अभी तक क्यों नहीं किया गया? निश्चित रूप से प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे में रखने पर विचार-विमर्श हो सकता है, लेकिन इसका कोई औचित्य नहीं कि अन्य न्यायाधीशों, संसद के भीतर सांसदों के कार्यो और वरिष्ठ नौकरशाहों को भी पारदर्शिता व जवाबदेही से मुक्त रखा जाए। यदि यही सब करना है तो फिर भ्रष्टाचार से लड़ने की बड़ी-बड़ी बातें क्यों की जा रही हैं? इस पर आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार ने जैसा रवैया लोकपाल विधेयक के मामले में अपना लिया है वैसा ही काले धन के संदर्भ में भी प्रदर्शित कर रही है। काले धन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी चेतना जागृत कर रहे बाबा रामदेव के सत्याग्रह का समय जैसे-जैसे करीब आता जा रहा है, सरकार वैसे-वैसे यह दिखावा करने में लगी हुई है कि इस मुद्दे को लेकर वह गंभीर है। जिस तरह बाबा रामदेव को सत्याग्रह न करने के लिए मनाने की कोशिश शुरू कर दी गई है उसे केंद्र सरकार की एक और चालबाजी कहा जाएगा। केंद्र सरकार के ऐसे रवैये को देखते हुए यह और आवश्यक हो जाता है कि बाबा रामदेव अपना संघर्ष जारी रखें और देश उनके पीछे उसी तरह एकजुट होकर खड़ा हो जैसा कि वह अन्ना हजारे के आंदोलन के वक्त खड़ा हुआ था।

राजनीति में कुनबापरस्ती


आरके धवन इंदिरा गांधी के समय से गांधी-नेहरू परिवार के अत्यंत करीबी माने जाते रहे हैं। राजीव गांधी के भी वह करीबी रहे, लेकिन सोनिया गांधी के अभ्युदय के बाद उनका दर्जा घटता गया और आजकल कांग्रेस कार्यकारिणी के विशेष आमंत्रित सदस्य भर रह गए हैं। पिछले दिनों उनका एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने राहुल गांधी को अपने पिता के समान रिश्तेदारों और मित्रों को महत्व देने में घातक परिणामों से सचेत किया है। उन्होंने कहा है कि मित्र और रिश्तेदार अपने को संभालने वाले व्यक्ति के समकक्ष समझकर आचरण करते हैं। उन्होंने राजीव गांधी के रिश्ते में भाई लगने वाले अरूण नेहरू, मित्र अरूण सिंह तथा कैप्टन सतीश शर्मा का नाम लेकर कहा है कि इन तीनों में से प्रथम दो को मंत्रिपरिषद में जूनियर मंत्री और शर्मा को राजीव गांधी ने सांसद बनाया। तीनों का व्यवहार ऐसा था, मानों वे ही प्रधानमंत्री हों। इसका अत्यधिक विपरीत प्रभाव वरिष्ठ मंत्रियों और उन कांग्रेसजनों पर पड़ा जो चाहे पद पर रहे हों या हाशिए पर, सदैव कांग्रेस के प्रति निष्ठावान रहे हैं। धवन का यह साक्षात्कार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा पार्टी और सरकार में समन्वय के लिए एक समिति बनाए जाने के बाद आया है। इस समिति में गुलाम नबी आजाद, मुकुल वासनिक, आनंद शर्मा और अहमद पटेल हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी समस्या के समाधान के लिए प्रणब मुखर्जी, एके एंटनी या वीरप्पा मोइली या फिर पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल की आवश्यकता नहीं समझी गई। राहुल गांधी का संदर्भ लेकर जो सलाह आरके धवन ने दी है, यदि उसके निहितार्थ की विवेचना की जाए तो यही स्पष्ट होता है कि उन्होंने राहुल गांधी का नाम भले ही लिया हो, लेकिन उनका लक्ष्य सोनिया गांधी हैं। उन्होंने वर्तमान मंत्रिमंडल की समीक्षा करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक भले मानुष हैं। वह वास्तव में राजनीतिक नहीं हैं। उनका उद्देश्य देश को अधिक मजबूती की ओर ले जाना है। उन्होंने अपने मंत्रियों को बोलने की पूर्ण स्वतंत्रता दे रखी है। फिर भी कुछ लोग इसलिए नहीं बोलते कि कहीं महत्वपूर्ण पदों को पाने में उनका बोलना बाधक न साबित हो, जबकि वे राजनीति में लंबे समय से हैं। इसके बावजूद मंत्रिमंडल में सामंजस्य का अभाव सार्वजनिक रूप से प्रगट होता रहता है। यद्यपि धवन ने पार्टी और सरकार के बीच किसी प्रकार के विरोधाभास से इंकार किया है, फिर भी यह कहा है कि बहुत से वरिष्ठ लोगों में उनकी वरिष्ठता के अनुरूप प्रतिष्ठा न मिलने के कारण क्षोभ अवश्य है। आरके धवन का यह बयान ऐसे समय आया है जब सोनिया गांधी के इटली सबंध की कुछ अंतराष्ट्रीय सौदों में भूमिका की बात सामने आई है। समाचारों के अनुसार लड़ाकू विमान की अमेरिका से खरीद का करार रद्द कर अब फ्रांस से बात चल रही है और उसमें इटली के कुछ लोगों का नाम बिचौलियों के तौर पर चर्चित हुआ है। इस समाचार का अभी तक खंडन नहीं हुआ है। राहुल गांधी के रिश्तेदार और मित्रमंडली में कौन-कौन हैं, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को होगी, लेकिन जिस प्रकार वे एक अन्य महामंत्री दिग्विजय सिंह का बड़बोलेपन में अनुशरण कर रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि धवन का इशारा उसी ओर था। भट्टा पारसौल के मामले ने राहुल गांधी की अभिव्यक्तियों को हास्यास्पद बनाने का ही काम किया है। इससे कांग्रेस की प्रतिष्ठा बढ़ने के बजाय गिरी ही है। आज जो हालात हैं उसमें धवन की सलाह राजनीति के नक्कारखाने में तूती के समान भी असर दिखा सकेगी, इसकी कोई संभावना नहीं है। किसी एक राजनीतिक दल में कुनबापरस्ती हो या मित्र को तरजीह मिलती हो तो स्थिति में सुधार की अपेक्षा की जा सकती है। दुर्भाग्य से इस मामले में सभी दल एक समान हैं। यद्यपि करुणानिधि इसी कारण कुनबे सहित डूब गए हैं फिर भी इस रास्ते पर चलने वालों की चेतना जागृत नहीं हो रही है। चाहे पार्टी का ढांचा खड़ा करना हो या सत्ता संभालने वालों का चयन, सभी दल कांग्रेस के अनुयायी बन गए हैं। आजादी के बाद से प्राय: राज्यों और केंद्र में भी कांग्रेस की ही सत्ता रही है और सत्ताधारी या तो नेहरू-गांधी परिवार का व्यक्ति रहा है या फिर उनका चहेता। प्रयास यही रहा है कि उसकेहाथ में सत्ता न जाने दी जाए जिसके पैर के नीचे जमीन हो। कामराज योजना इसी मनोवृत्ति का परिणाम थी और इंदिरा गांधी ने मोहरों की तरह से मंत्रियों को इस खाने से उस खाने में रखकर किसी राजनेता को भी हैसियत वाला नहीं बनने दिया। आरके धवन इस सभी के अंतरंग जानकार हैं, क्योंकि नेहरू के समय से, जब वह एक कनिष्ठ सहायक के रूप में प्रधानमंत्री कार्यालय में दाखिल हुए थे, निरंतर उनका दखल रहा है। इसलिए उनकी सलाह अनुभव के आधार पर है। कांग्रेस के वरिष्ठजनों और नीचे स्तर तक की नीतियों के कारण जो क्षोभ है वह अगले चुनाव में सफलता न मिलने पर पार्टी को 1977 की स्थिति में ले जा सकता है। (लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)