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Wednesday, April 6, 2011

केवल दक्षिण के नहीं हैं गृहमंत्री


संविधान के मुताबिक हर भारतीय को देश में कहीं भी रहने, काम करने का मूलाधिकार है। यदि दिल्लीवासी तय कर ले कि तमिलवासी राजधानी खाली कर दें तो? आज यही सवाल पूछा जाना चाहिए कि चिदम्बरम को तमिलनाडु का राज क्या चोल-चालुक्य राजाओें की जागीर के तौर पर दिया गया है? यदि हो तो उन्हें कावेरी के उस पार जाना होगा
पलनिअप्पन चिदम्बरम हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पढ़े हैं; अत: उन्होंने एडमण्ड बर्क का नाम सुना और पढ़ा होगा। ब्रिटेन में अट्ठारहवीं सदी के इस सांसद ने चुनाव जीतने के बाद अपने वोटरों से कहा था कि वे पूरे ब्रिटेन के प्रतिनिधि हैं। दूर इंग्लैण्ड से भारत से सरोकार रखने वाले बर्क ने काशी नरेश से र्दुव्‍यवहार करने वाले भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स पर हाउस ऑफ कामन्स में महाभियोग चलाया था और सजा दिलवाई थी। चिदम्बरम की सोच इतने वर्षों बाद भी तटीय और सतही ही रही। वे समझते हैं शायद आर्कोणम जंक्शन के उस पार भारत का भूभाग नहीं है। वर्ना विकीलीक्स के अनुसार भारत के गृहमंत्री न कहते कि उत्तर और पूर्वी भारत की निष्क्रियता के कारण दक्षिण और पश्चिम खमियाजा भुगत रहा है। यूं, देश को विंध्याचल पर्वत श्रृंखला ने भौगोलिक स्तर पर विभाजित कर ही दिया है। आर्थिक रूप से सम्पन्न और विपन्न तो हुए दोनों अंचल हैं ही। बजाय राष्ट्रीय एकीकरण की रफ्तार तेज करने के, केन्द्रीय गृहमंत्री अपनी सोच के कारण उसे क्षुण्ण कर रहे हैं।
वैचारिक परिवर्तनशीलता ही प्रगति का रूप नहीं
अगर उत्तर-पूर्व तथा दक्षिण-पश्चिम की बात कोई द्रमुक या शिवसेना नेता कहता तो यह उनके स्वाभाविक उद्गार माने जाते। वे सब हैं भी संकीर्ण, सामान्य स्तर के राजनेता। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अगुवा, उच्चतम न्यायालय में सपत्नीक वकालत करने वाले, देश के वित्त, उद्योग, वाणिज्य और अब गृहमंत्री रहे चिदम्बरम विरोधाभासों के समन्वय हैं। व्यापारी कुटुम्ब में जन्मे चिदम्बरम वामपंथी थे। अमेरिका में पढ़े और प्रगतिशील कहलाते थे। फिर वित्तमंत्री रहे तो ग्लोबलाइजेन के प्रतिपादक रहे। पार्टियां भी बदलीं। इंदिरा गांधी के साथ उनके कष्टकाल में कांग्रेसी रहे मगर बाद में राजीव गांधी का साथ छोड़कर जी. के. मूपनार की तमिल कांगेस में शामिल हो गए। जब कांग्रेस में लौटे तो सोनिया गांधी के करीब हो गए। अर्थात भांति-भांति के घाट-घाट का जलास्वादन कर चुके हैं। शायद सोचते हैं कि सियासी स्थिरता ही जड़ का पर्याय है; अत: वैचारिक परिवर्तनशीलता ही प्रगति का रूप है।
गृहमंत्री की गमनीय तीन खासियतें
पी. चिदम्बरम जैसे राष्ट्रनेता का आकलन साधारण बात नहीं है। सन् 1984 के दंगों के मसले पर अपनी प्रेस कान्फ्रेंस में संवाददाता से भिड़ गए तो जवाब में जूता मिला। जैसे बगदाद में जॉर्ज बुश को मिला था। इस पृष्ठभूमि का उल्लेख जरूरी इसलिए है कि उनकी सोच का आभास मिल सके। भारत का गृहमंत्री ऐसी गैरजिम्मेदाराना बात सोच भी सकता है? इसी पर आश्र्चय होना चाहिए! यूं, चिदम्बरम की तीन खास बातें गमनीय हैं। हिंदी के बारे में भी उनका रोष और विरोध सर्वविदित है। राजभाषा को राष्ट्रीय स्तर पर क्रियान्वित करना उनका दायित्व है। उनकी उदासीनता से गति धीमी पड़ गई है। पांच दशकों से केंद्र से जुड़े रहे और सांसद रहे, चिदम्बरम ने हिन्दी सीखी ही नहीं। दूसरी बात- आतंक विरोध पर उनकी किरदारी हिचकी लेती रही। गनीमत थी कि उनके पूर्व रहे गृहमंत्री (आज राज्यपाल) शिवराज पाटिल, आतंकी हमले के समय भी परिधान बदलते हैं। वे इतने हास्यास्पद हो गए थे कि कोई भी व्यक्ति पाटिल से बेहतर गृहमंत्री होता।
पैंतरा बदलने में माहिर
तीसरी बात- नक्सली प्रश्न का सामना करने वाले हैं। अपना कार्यक्रम बनाते-सुधारते चिदम्बरम ने जितने पैंतरे बदले उससे तो माओवादी भी दिग्भ्रमित हो गए होंगे। सेना का उपयोग पहला सुझाव था। फिर आया कि पुलिस ही अकेले सामना करेगी। जब नवीन पटनायक ने अपने अफसर को छुड़ाने के एवज में माओवादियों की अदला-बदली की तो, चिदम्बरम नाराज हो गए। अगर इतने ही दृढ़प्रतिज्ञ हैं तो अफजल और कसाब को लटकवा क्यों नहीं देते। राष्ट्र गौरव का मसला है। लेकिन एक बात पर चिदम्बरम की ताईद और तारीफ करनी होगी कि अमेरिकी आण्विक संधि पर मार्क्‍सवादियों की धमकी को नकार दिया। सरकार बचाने के लिए कांग्रेस ने कई समझौते किए। सांसदों की खरीद-फरोख्त तक हुई। पर चिदम्बरम अपने साथियों का हौसला बढ़ाते हैं। आखिर चिदम्बरम ने क्यों कहा कि पूर्व और उत्तर के प्रदेश न रहते तो भारत का विकास तेज होता? भारत के केंद्र पर चिदम्बरम कभी भी दृढ़ नहीं रहे। श्रीलंका में तामिलभाषियों का हितैषी यह गृहमंत्री सैनिक कार्रवाही पर तत्पर था। मगर मुम्बई के हिंदी भाषियों पर शिव सैनिकों द्वारा किए गए हमले पर बड़ी शोरभरी शांति बनाये रखा। आज यदि असम के विद्रोही चिदम्बरम से वार्ता हेतु तत्पर हैं तो इसलिए कि गृहमंत्री का कार्यभार संभालते ही वे गुवाहाटी गए जहां बमों और बंदूकों से उनका गर्मजोशीपूर्वक स्वागत किया गया था। वार्ता के लिए गृहमंत्री विवश हो गए।
उत्तरवासियों के ही बस की बात
वेचारे उत्तरीजन रोजी-रोटी की तलाश में पश्चिम और दक्षिण भी गये। हिन्दीभाषी जन न बम फोड़ सकते हैं, न बंदूक उठा सकते हैं वर्ना आतंक की भाषा सिखा देते। चिदम्बरम अर्थशास्त्री हैं। वे शायद भूल जाते हैं कि यदि मुम्बई को हिंदी भाषी छोड़ दें तो होटल, दूध, अखबार, खोंचे, टैक्सी ड्राइवर, पानवाले, खुदरा व्यापार खत्म हो जाएं। वहां के ये दुकानदार यदि घर वापस लौट आएं तो जनजीवन टूट जाएगा। तमिलभाषी इन कामों में न रुचि और न महारत रखते हैं। गनीमत है कि नीतीश कुमार की विकासशील नीतियों के कारण अब बिखरे बिहारी घर लौट रहे हैं। मगर बाकी राज्यों को नीतीश कुमार सरीखे नेता की प्रतीक्षा अभी लम्बी है। इस संदर्भ में याद करना होगा कि गोवा के कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिगम्बर कामथ ने रेलमंत्री के इस प्रस्ताव कि, पटना से वास्को डिगामा स्टेशन तक सीधी ट्रेन चलाई जाए, का विरोध किया था। उनका तर्क था कि गोवा में बिहारी भर जाएंगे। भारतीय संविधान में लिखा है कि 'हर भारतीय को देश में कहीं भी रहने और काम करने का मूलाधिकार है।' यदि दिल्लीवासी तय कर ले कि तमिलवासी राजधानी खाली कर दें तो? जब मुम्बई से गैर मराठीजन को हटाने की बात बाल ठाकरे ने की थी तो वरिष्ठ स्वाधीनता सेनानी और नेहरू काबीना के मंत्री रहे सदाशिव कान्हेंजी पाटिल ने जवाब दिया था कि मुम्बई बाल ठाकरे को दहेज में नहीं मिला है। इतिहास की बात है कि इसे पुर्तगाल के सम्राट ने ब्रिटिश राजकुमार को अपनी पुत्री के विवाह में दहेज में भेंट किया था। आज यही सवाल पूछा जाना चाहिए कि चिदम्बरम को तमिलनाडु का राज क्या चोल-चालुक्य राजाओें की जागीर के तौर पर दिया गया है? यदि हो तो उन्हें कावेरी के उस पार जाना होगा। यमुना तट छोड़कर।

सार्वजनिक प्रतिवाद के स्तर पर ऊंघता उत्तर भारत


चिदम्बरम या अन्य नेताओं की विद्वेषपूर्ण बयानबाजी से कुपित होना काफी नही है। इस असंतोष की अभिव्यक्ति उत्तर भारत के पुनर्निर्माण के सशक्त कार्यक्रम में भी होना चाहिए। अगर केंद्र इस क्षेत्रीय विषमता को दूर करना नहीं चाहता और इस पुनर्निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाना नहीं चाहता, तो उत्तर भारत को अपने सीमित संसाधनों को जोड़ कर और उनका रचनात्मक उपयोग करने की पहल करनी चाहिए। इस बवाल का सबक यही है
ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम देश भर के गृहमंत्री नहीं, बल्कि सिर्फ दक्षिण और पश्चिम भारत के गृहमंत्री हैं। अमेरिकी राजदूत से बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत और अधिक उन्नति कर सकता था। यदि देश में सिर्फ दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्य होते। यह स्पष्ट रूप से उत्तर भारत की गम्भीर अवमानना है। कोई और लोकतांत्रिक देश होता, तो ऐसे पूर्वाग्रहग्रस्त गृहमंत्री को तुरंत इस्तीफा दे देना पड़ता। लेकिन हमारे यहां गंगा उलटी बहती है। इसीलिए चिदम्बरम साहब इतना भर कह कर बच गए कि मैं विकीलीक्स द्वारा किए गए इस उद्घाटन की निंदा करता हूं। निंदनीय विकीलीक्स का यह उद्घाटन है या गृहमंत्री का बीमार सोच इस पर चिदम्बरम को कुछ नहीं कहना है क्योंकि सचाई के मामले में विकीलीक्स की साख उनसे कहीं बहुत ज्यादा है। अमेरिकी राजदूत ने भी इस बातचीत का खंडन नहीं किया है। चिदम्बरम भी यह दावा नहीं कर रहे हैं कि विकीलीक्स झूठ बोल रहा है या मेरा आशय कुछ और था। इस तरह, वे अपना अपराध स्वीकार कर रहे हैं पर शर्मिंंदा होने के बजाय विकीलीक्स पर ही इल्जाम मढ़ रहे हैं। इसे ही कहते हैं, संदेश भेजने वाले की जगह संदेशवाहक पर ही हमला कर बैठना।
बयान पर तूफान क्यों नहीं
राममनोहर लोहिया सहित कई नेताओं और विचारकों ने इस सचाई को शब्द देने की हिम्मत दिखाई है कि भारत मूलत: एक मुरदा देश है। बड़ी से बड़ी ट्रेजेडी पर इसकी नसों में स्पंदन नहीं होता। यह बात हमें बुरी या असह्य लग सकती है, पर अपने आचरण द्वारा इस मान्यता का खंडन करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। भारत एकदम मुरदा देश नहीं है, इसके साक्ष्य समय-समय पर मिलते रहे हैं, जिसका हाल का एक उदाहरण है उत्तर प्रदेश में दलित उभार का ज्वार या बिहार में मतदाताओं द्वारा लालू प्रसाद का तिरस्कार। लेकिन ये राख की ढेर से पैदा होने वाली कुछ चिनगारियां भर हैं। आम तौर पर दिल खौलते रहने पर भी उत्तर भारत का बृहत समुदाय सार्वजनिक प्रतिवाद के स्तर पर ऊंघता रहता है। अन्यथा गृह मंत्री चिदम्बरम के इस सनसनीखेज बयान पर हिन्दी भाषी राज्यों में बहुत बड़ा तूफान खड़ा हो जाना चाहिए था। नि:संदेह हिन्दी प्रदेश के कुछ नेताओं ने चिदम्बरम की पर्याप्त खिंचाई की है और प्रधानमंत्री से दरख्वास्त की है कि वे संकीर्ण सोच के इस मंत्री को मंत्रिमंडल से तुरंत हटा दें। अगर ये नेता ऐसा न करते, तो उत्तर भारतीय समुदाय में इनकी साख और गिर जाती। लेकिन अपनी साख की वास्तविक चिंता की मांग इससे कहीं ज्यादा है। वे अगर उत्तर भारत के इस अपमान पर सार्वजनिक आलोड़न पैदा नहीं कर सकते थे, तो अन्ना हजारे की तरह कम से कम जंतर-मंतर पर बैठ तो सकते ही थे। पर संसद में और संसद के बाहर हल्की-सी बयानबाजी कर वे शांत हो गए। मानो कोई दस मिनट तक अपनी बात कह कर चुप बैठ जाना, उनके लिए पर्याप्त हो। इससे उत्तर भारत के राजनीतिक नेतृत्व की आत्महीनता ही जाहिर होती है, जिसे हम राजनीतिक और सामाजिक पराभव का एक और चिह्न मानते हैं।
असमान विकास पर उद्विग्नता क्यों नहीं
सब कुछ के बावजूद, यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उत्तर भारत की विकास दर अन्य राज्यों की तुलना में कम है। यह बात जनसंख्या वृद्धि के हाल ही में प्रकाशित आंकड़ों से भी साबित होती है। देश की आबादी बढ़ाने में उत्तर भारत का योगदान शर्मनाक है। वस्तुत: यह देश के इस सबसे बड़े भूखंड के आर्थिक और सामाजिक ह्रास की कहानी ही सुनाता है। कायदे का सवाल यह नहीं है कि इस गम्भीर मसले पर केंद्रीय गृहमंत्री क्या सोचते हैं; इसलिए कि वे स्वयं दक्षिण भारत के हैं और सम्पूर्ण भारत के प्रति अपने अनुराग के लिए कभी विख्यात नहीं रहे। कायदे का सवाल यह है कि उत्तर भारत का राजनीतिक और बौद्धिक नेतृत्व विकास की इस असमानता पर उद्विग्न क्यों नहीं है? अपने घर की फिक्र हम खुद नहीं करेंगे, तो दूसरों से इसकी उम्मीद क्या की जाए? बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अरसे से अपने राज्य के लिए विशेष पैकेज की मांग निरंतर करते रहे हैं, यह प्रशंसा की बात है। लेकिन अन्य हिन्दी भाषी राज्यों को क्यों सांप सूंघ गया है उनके मुख्यमंत्री सिर्फ इतने से क्यों हरे-भरे नजर आते हैं कि वे अपने-अपने राज्य के मुख्यमंत्री हैं? उनकी महत्त्वाकांक्षा यह कहलाने की क्यों नहीं है कि वे एक विकसित और उन्नत राज्य के मुख्यमंत्री हैं? जैसे नरेंद्र मोदी को, उनकी राजनीति के बारे में जो भी कहिए अपने गुजरात पर गर्व है। उसी तरह हिन्दी भाषी राज्यों के मुख्यमंत्री अपने-अपने राज्य के लिए कुछ ऐसा करने के लिए बेचैन क्यों नहीं हैं कि उस पर वे भी गर्व कर सकें?
सरकारों ने जारी रखी अंग्रेजी-राज की नीति
यह बात नजरअंदाज नहीं की जानी चाहिए कि उत्तर भारत की उपेक्षा अंग्रेजी राज द्वारा उसकी सत्ता के शुरु आती दिनों से ही शुरू हो गई थी। यही वह इलाका है, जिसके हिम्मती लोगों ने 1857 में अंग्रेजी राज को चुनौती दी थी और दोनों ओर से भयावह खून-खराबा हुआ था। बाद में कांग्रेसी नेतृत्व ने भी उस उपेक्षा भाव को जारी रखा, क्योंकि उसे भी इस विद्रोही इलाके के तेवरों से डर लगता था। इसके बावजूद कि कई या सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री इसी इलाके का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करते रहे, पर उनके सरोकार अपने-अपने चुनाव क्षेत्र से आगे कभी नहीं गए। अमेठी, बलिया, मुजफ्फरपुर, सासाराम और लखनऊ ही उत्तर भारत नहीं हैं। कुछ इलाकों को चमकाने भर से उत्तर भारत की विशाल जनसंख्या के चेहरे पर मुस्कान नहीं आ सकती। ध्यान देने की बात है कि माओवाद से अनुराग रखने वाले लोगों में एक बड़ी संख्या हिन्दी भाषी राज्यों में ही बसती है। यह इस तथ्य की ओर एक गम्भीर संकेत है कि इन राज्यों में जन असंतोष का स्तर ऊंचा है। इसलिए सिर्फ चिदम्बरम या अन्य नेताओं की विद्वेषपूर्ण बयानबाजी से कुपित होना काफी नहीं है। इस असंतोष की अभिव्यक्ति उत्तर भारत के पुनर्निर्माण के सशक्त कार्यक्रम में भी होना चाहिए। अगर केंद्र इस क्षेत्रीय विषमता को दूर करना नहीं चाहता और इस पुनर्निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाना नहीं चाहता, तो उत्तर भारत को अपने सीमित संसाधनों को जोड़ कर और उनका रचनात्मक उपयोग करने की पहल करनी चाहिए। इस बवाल का सबक यही है।