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Friday, April 15, 2011

अन्ना को फिर बैठना होगा अनशन पर


अन्ना हजारे 15 अगस्त से फिर अनशन करेंगे। ऐसा अन्ना नहीं बल्कि बन रहे हालात बता रहे हैं। अन्ना हजारे ने कह रखा है कि यदि संसद में लोकपाल बिल पारित होने में कोई दिक्कत आई, या कोई हील-हुज्जत हुई तो वे आगामी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर फिर अनशन पर बैठेंगे। इस बार वे अपना अनशन तब तक नहीं तोड़ेंगे जब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ ठोस कार्रवाई शुरू न हो जाए। अब 16 अप्रैल से लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए गठित समिति की बैठकें शुरू होंगी। समिति को 30 जून तक बिल का मसौदा तैयार कर लेना है, ताकि उसे मॉनसून सत्र में संसद में पेश किया जा सके। समिति में बिल के स्वरूप को लेकर विवाद की पूरी आशंका है, इसलिए अन्ना ने बैठक की पूरी वीडियो रिकॉर्डिग करने की बात कही, ताकि बिल न बन पाने की स्थिति में अड़ंगेबाजों को जनता के सामने लाया जा सके। इसका विरोध कर कांग्रेस ने पहले ही विवाद की नींव रख दी है। ऐसे में उनके लिए घबराने वाली बात है जो जंतर मंतर पर अन्ना के अनशन से बने सख्त माहौल से घबरा रहे थे और मानकर चल रहे थे कि यदि सौदा नहीं पटा तो जंतर मंतर राजनीतिक सत्ता को उखाड़ फेंकने वाली तहरीर चौक बन जाएगी। उनको बस अन्ना के अनशन खत्म होने का इंतजार था। अब भी यह सोच है कि नए अनशन के वक्त अन्ना 5 अप्रैल सरीखा समर्थन हासिल नहीं कर पाएंगे। यह इंतजाम किया जा रहा है कि किसी भी हालत में पुराना समर्थन हासिल न हो सके। उनकी सफलता बाबा रामदेव ने पहली तीर क्या चलाई, चिड़ीमारों की पूरी फौज बाहर आ गई है। कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह से लेकर लालकृष्ण आडवाणी और प्रभात झा तक गोलबंद हैं। इनके लिए बर्दाश्त से बाहर की बात है कि जिस राजनीति में इन लोगों ने जिंदगी झोंक दी उससे ज्यादा लोकप्रिय एक गैर-राजनीतिक शख्स हो गया। हर पहल को आरक्षण के आइने से देखने वाला तबका अन्ना के खिलाफ अलग से मोर्चा खोले बैठे हैं, मानो देश की 85 फीसदी आरक्षित आबादी भ्रष्टाचार से निष्प्रभावित हो। 

अन्ना के गैर-राजनीतिक व्यक्तित्व ने भी कई समर्थकों को अलग वजूद के बहाने आलोचना करने का मौका दिया है। मेधा पाटेकर और मल्लिका साराभाई उनकी इसलिए आलोचक हो गईं कि वे राजनीतिक हस्ती नहीं हैं। इनको पता नहीं कि राजनीति से परे होना ही अन्ना की सबसे बड़ी ताकत है। इसे यों भी कह सकते हैं कि आजादी के दौर से अब तक लोग उनको ही मानते रहे हैं जो अराजनीतिक हैं। मोहनदास करमचंद गांधी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, जयप्रकाश नारायण, कांशीराम आम जनता के नेता थे क्योंकि उन्होंने आज की परिभषा वाली राजनीति नहीं की। महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी को खत्म करने की पैरवी की तो डॉ. अम्बेडकर आरक्षण का इंतजाम किसी दल के दायरे में नहीं बल्कि पूरी जरूरतमंद आबादी के लिए करते रहे। जेपी का राजनीतिक आंदोलन स्थापित राजनीतिक परंपरा के खिलाफ था, इसलिए इसे अराजनीतिक कहा जा सकता है। कांशीराम ने दलित सबलता की राजनीति को कारगर बनाने के लिए बाकी राजनीतिक दलों को समान दूरी रखकर अपना मुकाम हासिल किया। अब अन्ना के बहाने पिछली पीढ़ी के प्रवर्तकों का जिक्र इसलिए भी जरूरी है कि अन्ना में मौजूदा राजनीतिज्ञों की फौज से अलग बहुत कुछ है। मसलन जंतर-मंतर की सफलता के दौरान भी उन्होंने अपने गांव रालेगान सिद्धि गांव को याद रखा। दिल्ली के सत्ता शिखर को हिलाने के बाद आराम के लिए अन्ना ने रालेगान सिद्धि के मंदिर के अपने दालान को पसंद किया। खेतों मे गए, किसानों की खैर-खबर ली। यह कोई मार्केटिंग स्ट्रैटजी नहीं थी, अन्ना का स्वाभाविक ग्राम प्रेम था।

ऐसी और भी बातें हैं जो बताती हैं कि भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के पैरोकारों के लिए अन्ना हजारे को फंसा पाना आसान नहीं होगा। होता तो शरद पवार के लोग उनको ध्वस्त कर चुके होते। वैसे अन्ना की पसंद बने पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण के खिलाफ इलाहाबाद में जमीन खरीद घोटाले का एक आरोप उछल आया है लेकिन शांति भूषण अन्ना के सिर्फ एक अभियान के साथी हैं। फिर वह आरोपों का जवाब देने में भी सक्षम हैं। वहीं, भ्रष्टाचार विरोधी बातूनी रामदेव बाबा जिस तरह के आरोपों से घिर गए हैं उस प्रकार के आरोप अन्ना कभी नहीं लग सकेंगे।


राजनीति का सबसे बड़ा छल


उच्च पदस्थ लोगों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक प्रभावी कानून बनाने का वायदा आजादी के बाद भारत की जनता के साथ किया जाने वाला राजनीतिक वर्ग का सबसे बड़ा छल है। जवाहर लाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक प्रत्येक सरकार ने एक ऐसे संस्थान की स्थापना का वायदा किया है जो भ्रष्ट मंत्रियों पर अंकुश लगाएगा, लेकिन किसी ने इस वायदे को पूरा करने की गंभीर कोशिश नहीं की। पिछले दिनों अन्ना हजारे के साथ समझौते के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जो घोषणा की वह निश्चित रूप से इसी छल को एक नए स्तर पर ले गई है। भ्रष्टाचार के कैंसर ने हमारे आजादी के आंदोलन की महान प्राप्तियों को नष्ट करना आरंभ कर दिया है, इसकी सबसे पहले स्वीकारोक्ति 1960 के दशक में तब हुई जब संथानम समिति ने इस समस्या पर विचार किया और अपने कुछ सुझाव दिए। इसके साथ ही पहले प्रशासनिक सुधार आयोग की रपट भी आई, जिसने एक लोकपाल की नियुक्ति का सुझाव दिया, जो मंत्रियों के भ्रष्ट आचरण पर निगाह रखे। केंद्रीय स्तर पर लोकपाल की तर्ज पर राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की जानी थी, लेकिन लोकपाल की नियुक्ति के साथ धोखेबाजी की शुरुआत इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल से आरंभ हो गई। उनकी सरकार ने 1968 में लोकपाल बिल लोकसभा में पेश किया-भलीभांति यह जानते हुए कि निचले सदन में पेश किया गया बिल सदन भंग किए जाने की दशा में मृत हो जाएगा। यही हुआ। इसके बाद से इस बिल को पेश करने के आठ आधे-अधूरे प्रयास किए जा चुके हैं और इनमें से ज्यादातर तब किए गए जब कांग्रेस सत्ता में थी। चार दशक की इस लीपापोती के बाद गत वर्ष मनमोहन सिंह की सरकार ने सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के समर्थन से लोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया वह लोगों को धोखा देने की एक और कोशिश थी। इस मसौदे में नागरिकों को भ्रष्ट मंत्रियों और सांसदों के खिलाफ लोकपाल से शिकायत करने का अधिकार देने के बजाय सरकार ने हरसंभव तरीके से भ्रष्ट तत्वों को बचाने और शिकायकर्ता को भयभीत करने के उपाय किए। मसौदे में कहा गया कि लोकपाल केवल एक सलाहकार के रूप में कार्य करेगा, जो सक्षम अधिकारी तक शिकायतों को अग्रसारित करेगा। उसके पास न तो पुलिस की शक्तियां होंगी और न ही वह एफआइआर दर्ज कर सकेगा। सीबीआइ भी उसके दायरे में नहीं आएगी। इसके अतिरिक्त सरकारी लोकपाल भ्रष्टाचार के किसी मामले का स्वत: संज्ञान नहीं ले सकेगा। वह तभी कार्रवाई की शुरुआत कर सकेगा जब लोकसभा के स्पीकर अथवा राज्यसभा के सभापति ऐसा करने की अनुमति देंगे। इस सबके बाद दोषी राजनेताओं को छह माह से सात वर्ष की सजा सुनाई जाएगी। इस बकवास बिल के विपरीत अन्ना हजारे ने जन लोकपाल बिल के रूप में जो मसौदा तैयार किया है उसके तहत लोकपाल चुनाव आयोग सरीखी एक स्वतंत्र संस्था होगी, जिसके पास मंत्रियों, न्यायाधीशों और नौकरशाहों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों को सुनने की शक्ति होगी। वह एफआइआर भी दर्ज कर सकेगा। कुल मिलाकर जन लोकपाल बिल की भूमिका केवल सलाहकार की नहीं होगी। अन्ना हजारे की टीम ने जन लोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया उसमें यह व्यवस्था दी गई है कि लोकपाल लोगों से सीधे शिकायतें प्राप्त करेगा और इसके अनुरूप कार्रवाई करेगा। सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल और अन्ना हजारे के जनलोकपाल में एक अन्य बड़ा अंतर है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी यह नहीं चाहते हैं कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री भी आएं-खासकर विदेश, सुरक्षा और रक्षा संबंधी मामलों को लेकर। इसके विपरीत अन्ना हजारे का मसौदा ऐसी कोई बंदिश नहीं लगाता और यह सही भी है। बोफोर्स एक रक्षा सौदा था, जिसमें सेना के लिए तोपें खरीदी गई थीं। इस सौदे में गांधी परिवार के एक मित्र ओट्टावियो क्वात्रोची ने कमीशन प्राप्त किया और इस मामले ने भारतीय राजनीति को हिला दिया। मौजूदा संप्रग सरकार नहीं चाहती है कि फिर से ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न हो। सरकारी लोकपाल में बड़ी चतुराई से लिखा गया है कि सब कुछ सुरक्षा मामले को देखते हुए गोपनीय रखा जा सकता है और इस तरह से लोकपाल उसकी जांच नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए यदि सरकारी प्रस्ताव के अनुरूप लोकपाल होता तो पिछले वर्ष जब 1.76 लाख करोड़ रुपये का 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो बड़ी आसानी से स्पेक्ट्रम आवंटन को सुरक्षा से जुड़ा मामला बता दिया जाता। तब यह घोटाला लोकपाल के दायरे से बाहर हो जाता। सरकारी लोकपाल और जनलोकपाल में अंतर के अन्य मामले भी हैं। अन्ना हजारे द्वारा प्रस्तावित मसौदे में दो साल के भीतर जांच और मुकदमे की कार्रवाई पूरी करने की व्यवस्था की गई है, लेकिन सरकारी मसौदे में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि दोषी लोगों को सजा देने के मामले में भी मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने नरमी की व्यवस्था की है। सरकारी मसौदे के मुताबिक भ्रष्टाचार के दोषियों को छह माह से सात साल तक की सजा हो सकती है। इसके विपरीत अन्ना हजारे द्वारा प्रस्तावित मसौदे में पांच वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान किया गया है। आजकल इस पर भी लोगों में सहमति है कि भ्रष्टाचार के दोषियों को अपनी अवैध संपत्ति के साथ यूं ही बच नहीं निकलने देना चाहिए. बल्कि उनसे नुकसान की भरपाई कराई जानी चाहिए। अन्ना हजारे के मसौदे में कहा गया है कि सरकार को जो क्षति होती है उसकी भरपाई दोषी लोगों से की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि ए. राजा 1.76 लाख करोड़ रुपये के सरकारी नुकसान के दोषी हैं तो उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली जानी चाहिए। दुर्भाग्य से मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ऐसा कोई प्रावधान नहीं चाहते। उनके मसौदे में भ्रष्ट तत्वों से वसूली के संदर्भ में कोई प्रस्ताव नहीं है। इसके अतिरिक्त सरकारी मसौदे में शिकायतकर्ताओं को भयभीत करने के भी पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। मसौदे में कहा गया है कि झूठी शिकायतें देने वालों को दंडित किया जाना चाहिए और उन्हें जेल भी भेजा जाना चाहिए। अन्ना हजारे के मसौदे में भी कहा गया है कि जो लोग झूठी शिकायतें दर्ज कराते हैं उन पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए, लेकिन उनका मसौदा आम आदमी को भयभीत नहीं करता। यह विचित्र है कि भ्रष्टाचार पर इस तरह का रवैया रखने वाली केंद्र सरकार अन्न्ना हजारे के साथ हुए समझौते को अपनी नैतिकता और ईमानदारी का प्रमाण बता रही है। बिल्कुल सही कहा गया है कि आप सभी को हर समय मूर्ख नहीं बना सकते, लेकिन लगता है कि यह पाठ नेहरू-गांधी परिवार कभी नहीं सीखेगा। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं).

रामदेव को पार्टी बनाने से रोकने में जुटी भाजपा


 कभी भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में शुमार रहे केएन गोविंदाचार्य का नया अभियान भाजपा व संघ की नींद उड़ा सकता है। वे नई राजनीतिक ताकत खड़ी करने जा रहे हैं, जिसमें भाजपा समेत सभी दलों के लोग तो होंगे ही, बाबा रामदेव भी खास तौर पर जुड़ेंगे। इसकी घोषणा जून में होने की संभावना है। इसके पहले देशभर में जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। इस स्थिति में संभावित नुकसान से बचने के लिए भाजपा की कोशिश है कि बाबा रामदेव नई पार्टी न बनाएं। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन व भारत विकास संगम की सफलता से उत्साहित गोविंदाचार्य नए राजनीतिक अभियान पर तेजी से काम कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए राष्ट्रवादी मोर्चा के बैनर तले विभिन्न दलों के लोगों को जोड़ने की शुरुआत कर दी है। गुरुवार को इस मोर्चा की बैठक में भाजपा के पूर्व सांसद बनवारी लाल पुरोहित, लोक सत्ता पार्टी के जयप्रकाश नारायण व छोटे क्षेत्रीय दलों के नेता जुटे। इसके दरवाजे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए खुले हैं। उनका उद्देश्य विकेंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था व देसी सोच वाले विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को साथ लेकर आने का है। राष्ट्रवादी मोर्चा की बैठक में देश की मौजूदा शासन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के साथ नए राजनीतिक विकल्प पर भी चर्चा की गई। इसमें सभी वक्ताओं ने गोविंदाचार्य को चाणक्य की भूमिका में आकर मौजूदा भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की कमान सौंपी है। गोविंदाचार्य व बाबा रामदेव अपने इस अभियान को गति देने के लिए देशभर में ग्राम समितियां बनाने के साथ योग कक्षाएं भी लगाएंगे। लगभग ढाई लाख योग कक्षाओं के साथ देशभर के 600 जिलों में यह कार्यक्रम चलेंगे। इसके बाद जून में फैसला किया जाएगा कि चुनावी राजनीति में किस तरह से उतरा जाए इसके लिए तीन तरह के विकल्प है। पहला यह कि मौजूदा राजनीतिक दलों में ही ऐसे लोगों को तैयार किया जाए जो चुनाव लड़कर चुनकर संसद में आए। दूसरा, इस विचारधारा के समर्थक निर्दलीय तौर पर चुनाव मैदान में उतरें और तीसरा यह कि नया राजनीतिक दल बनाकर चुनाव मैदान में उतरा जाए|