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Monday, March 14, 2011

पंजाब बड़े आंदोलन के लिए खदबदा रहा


पंजाब सरकार ने विधानसभा में 1 अक्टूबर 2010 को 16 विधेयक पारित करवाए। इनमें दो कानून ऐसे हैं जो संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का सरेआम उल्लंघन हैं। पहला कानून पंजाब प्रिवेंशन ऑफ पब्लिक एवं प्राइवेट प्रापर्टी एक्ट-2010 है। इस कानून में शांत तरीके से इकट्ठे होने व अपनी बात कहने का अधिकार भी खत्म हो जाएगा। दूसरा कानून विशेष सुरक्षा ग्रुप है। इस प्रस्तावित कानून की कुछ धाराएं ऐसी हैं जो इतनी खतरनाक हैं कि अंग्रेजों के रोलेट एक्ट में भी नहीं थीं

पंजाब की जरखेज मिट्टी एक बार फिर किसी नए आंदोलन के लिए तैयार नजर आती है। इसके संकेत लोगों में पैदा हो रही बेचैनी, विभिन्न संगठनों द्वारा एक मंच आ कर लोगों के मुद्दों पर संघर्ष करना तथा ऐसे संघर्षो को रोकने के लिए सरकार के बनाए जा रहे लोकतंत्र विरोधी कानूनों के रूप में दिखाई देने लगे हैं। हरितक्रांति के बाद देश के खुशहाल राज्य के तौर पर जाने जाते पंजाब की स्थिति अब बदल चुकी है। राज्य का भूजल खतरनाक सीमा तक नीचे चला गया है, राज्य के ज्यादातर ब्लाक अति शोषित जोन घोषित हो चुके हैं। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है। आबोहवा में घुल रही जहर के चलते पंजाब कैंसर का घर बनता जा रहा है। कृषि घाटे का धंधा बनने के कारण किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। मजदूर दिहाड़ी के लिए भटक रहे हैं। खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा तहस-नहस हो गई है। स्वास्थ्य सुविधाएं जैसे पंख लगा कर उड़ गई हों। भगत सिंह जैसे शहीदों की धरती पर नशों की छठी नदी बहने लगी है। इन सब के बीच पंजाब का सामाजिक ताना- बाना भी बिखरता दिखाई देने लगा है। सिख गुरुओं के जाति-पाति खत्म करने व सरबत के भले के सिद्धांत का रंग भी राजनीतिक स्वार्थी हितों के चलते फीका पड़ता दिखाई देने लगा है। वियाना में रविदासीया समुदाय के एक संत की हत्या के बाद हुए टकराव, अब डेरा सच्चा सौदा के प्रेमियों व पंथक संगठनों के समर्थकों के बीच लगातार हो रही झड़पें इसकी कहानी कह रही हैं। लेकिन पंजाब के किसान, मजदूर व अन्य संगठन सक्रिय हो कर एक बार फिर लोगों को संगठित करने में जुटे हुए हैं। भले किसान, मजदूर व अन्य संगठन विभिन्न भागों में बंटे हुए हैं लेकिन समय के दबाव ने इनको एक मंच पर आने को मजबूर कर दिया है। स्थिति की गम्भीरता यह है कि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना ने पंजाब सरकार के कहने पर केवल बठिंडा व संगरूर दो जिलों का डोर टू डोर सर्वे किया है। इसमें चौंकने वाले तथ्य सामने आए हैं। पांच वर्षो में दोनों जिलों में 2890 किसान व मजदूर संगठनों ने सदस्यों ने आत्महत्या की है। इन परिवारों को राहत के तौर पर एक पैसा भी नहीं दिया गया। अन्य जिलों का भी सर्वेक्षण करवाने का सरकार ने वादा किया था लेकिन इसके लिए पैसा ही नहीं जारी किया गया। 17 मजदूर व किसान संगठन एक गठबंधन के तौर पर आंदोलन कर रहे हैं। ट्रेड यूनियन खास तौर पर आंगनवाड़ी वर्करों की जद्दोजहद ने एक नया मुकाम हासिल किया है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के गृह क्षेत्र में प्रदशर्न करते ठेके पर रखे पैरामेडिकल स्टाफ पर जोरदार लाठीचार्ज हुआ जिस में कई लड़कियां भी जख्मी हो गईं। ताकत की राजनीति की इसी मानसिकता के चलते पंजाब सरकार ने विधानसभा में 1 अक्टूबर 2010 को 16 विधेयक पारित करवाए इनमें दो कानून ऐसे हैं जो संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के सरेआम उल्लंघन हैं। पहला कानून पंजाब प्रीवेंशन ऑफ पब्लिक एवं प्राइवेट प्राप्र्टी एक्ट-2010 है। इस कानून में शांत तरीके से इक्ट्ठे होने व अपनी बात कहने का अधिकार भी खत्म हो जाएगा। कानून की धारा 3 में लिखा है कि किसी भी शांतिपूर्ण मार्च, प्रदर्शन व रैली के लिए आर्गेनाइजरों को जिला उपायुक्त से स्वीकृति लेनी पड़ेगी। मंजूरी न मिलने पर सरकार के पास अपील की जा सकेगी। यदि फिर भी मंजूरी नहीं मिली तो भी कोई प्रदशर्न करने पर आर्गेनाइजेर व इसमें शामिल होने वालों को दो वर्ष की सजा व 25 हजार रु पये जुर्माना हो सकता है। यदि इस दौरान कोई अगजनी की घटना घटती है तो सजा तीन वर्ष, विस्फोटक घटना पर 7 वर्ष की सजा व 7-0 हजार रु पये तक जुर्माना हो सकता है। कोई भी अदालत प्रोसिक्यूशन एजेंसी को बताए बिना जमानत नहीं दे पाएगी। यदि मार्च की मंजूरी मिल गई तो जिस पुलिस अधिकारी की ड्यूटी लगेगी, आयोजक उस के पास जा कर मार्च व प्रोसेसन का रूट तय करवाएगा। इस तरह शांतिपूर्ण आंदोलनों को पूरी तरह सिविल व पुलिस प्रशासन के रहमोकरम पर छोड़ दिया जाएगा। दूसरा कानून विशेष सुरक्षा ग्रुप है। जिसके उद्देश्य में लिखा है कि इंटेलिजेंस की रिपोर्टों के अनुसार पंजाब में बड़ी हस्तियों को जानमाल का खतरा है। इसलिए एक विशेष सुरक्षा ग्रुप की जरूरत है। सवाल है कि जब पंजाब को आतंकवाद के दौरान भी ऐसे कानून की जरूरत नहीं पड़ी तो अब ऐसे कानून को क्यों लाया जा रहा है? इस प्रस्तावित कानून की कुछ धाराएं ऐसी हैं जो इतनी खतरनाक हैं कि अंग्रेजों के रोलेट एक्ट में भी नहीं थी। इसमें ‘देशद्रोह’ की जद में लगभग प्रत्येक व्यक्ति आ सकता है। इसकी परिभाषा में लिखा है कि कोई भी गैर कानूनी गतिविधि देशद्रोह माना जाएगा। किसी भी सार्वजनिक जगह पर बीड़ी-सिगरेट पीना गैर कानूनी के साथ साथ अब देशद्रोह भी हो जाएगा। इस के अलावा विशेष ग्रुप के किसी भी अधिकारी व कर्मचारी पर उसकी डिय़ूटी निभाने के दौरान की कार्यवाही के लिए किसी अन्य कानून के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकेगा। इसमें किसी व्यक्ति की हत्या तक भी शामिल है। यह नागरिकों को मारने का खुला लाईसेंस है। इन प्रस्तावित कानूनों के खिलाफ 34 किसान, मजदूर, युवा, छात्र व मुलाजिम संगठनों ने एकजुट होकर जिला स्तर पर धरने दिए। इस दबाव के चलते फिलहाल अधिसूचनाएं तो जारी नहीं हुई लेकिन तलवार फिलहाल लटक रही है। यह तलवार किसी और ने नहीं बल्कि देश में 1975 में लागू किए गए आपातकाल के 19 महीने तक मोर्चा लगा कर जेलें भरने की मिसाल कायम करने वाले शिरोमणिअकाली दल ने लटकाई है।

Saturday, March 12, 2011

संप्रग की स्थिरता का सवाल


द्रमुक ने कांग्रेस के साथ चुनावी समझौता किया और वह संप्रग सरकार में भी बनी रहेगी। द्रमुक द्वारा पहले संप्रग सरकार से समर्थन वापसी एवं फिर समझौता करने का यह कदम पहली नजर में ही अस्थिर राजनीति का सूचक लगता है और ऐसा है भी, लेकिन यह अस्वाभाविक नहीं है। संप्रग सरकार से द्रमुक की समर्थन वापसी यों भी बड़ी राजनीतिक घटना नहीं मानी जा रही थी। इसके कारण साफ थे। लोकसभा के अंकगणित में संप्रग के 272 में से द्रमुक के 18 सांसदों के बाहर होने पर भी सपा के 22, बसपा के 21 एवं राजद के चार सांसदों का बाहर से समर्थन सरकार को प्राप्त है। दूसरे, खुद द्रमुक ने मुद्दा आधारित समर्थन देने की बात कहकर समर्थन वापसी पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया था। मुद्दा अधारित समर्थन का व्यावहारिक अर्थ भी समर्थन ही है। द्रमुक मंत्रियों के त्यागपत्र देने की घोषणा में भी पुन: स्वीकार न करने की संकल्पबद्धता का अभाव था। जाहिर है, द्रमुक स्वयं क्या करे, क्या न करें की मन:स्थिति में फंसी थी। साफ लग रहा था कि सीट बंटवारे का रास्ता आसानी से निकल जाएगा। द्रमुक कांग्रेस को 60 सीटें देने पर राजी हो चुकी थी, जो पिछले विधानसभा चुनाव से 12 स्थान अधिक है। कांग्रेस तीन स्थान तथा कुछ क्षेत्र बदलना चाहती थी। यह प्रश्न निश्चय ही कायम रहेगा कि अगर द्रमुक 63 स्थान कांग्रेस को देने पर राजी हो ही गई तो उसने समर्थन वापसी जैसा अतिवादी कदम क्यों उठाया? वास्तव में इसी प्रश्न के उत्तर में इसका राजनीतिक महत्व निहित है। यह समझना भूल होगी कि वाकई यह तनाव केवल सीटों तक सीमित था। सीट बंटवारे का यह मतभेद भी कांग्रेस एवं द्रमुक के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक था। ए राजा की गिरफ्तारी के साथ ही राजनीतिक रिश्ते में खाई पैदा होनी शुरू हो गई थी। सीबीआइ 2जी स्पेक्ट्रम की जांच करती हुई करुणानिधि के परिवार तक पहुंच चुकी है। सीबीआइ के आरोप पत्र में कलईग्नर टीवी चैनल का भी नाम है। आरोप यह है कि डीबी रियल्टी से कलईग्नर टीवी को 206 करोड़ रुपये का निवेश मिला, जिसकी शाखा स्वान टेलीकॉम को राजा ने लाइसेंस दिलाने में मदद की। इस टीवी चैनल के बोर्ड में करुणानिधि की बेटी और सांसद एम कोनीमोझी हैं। कलईग्नर टीवी चैनल पर छापा पड़ चुका है और अनके दस्तावेज जब्त किए गए हैं। द्रमुक के अंदर इसे लेकर आक्रोश है। द्रमुक ने राजा का जितनी दृढ़ता से समर्थन किया है, उसी से साफ है कि वह उनकी गिरफ्तारी तथा उसके बाद हो रही कार्रवाई के विरुद्ध है। इसलिए पार्टी की 38 सदस्यीय उच्चाधिकार समिति ने भले प्रस्ताव में केवल विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे पर कांग्रेस के निष्ठुर रवैये को कारण बताया, इसकी जड़ें अन्यत्र थीं। द्रमुक प्रमुख एम करुणानिधि का यह कथन कि कांग्रेस ने उन्हें गठबंधन तोड़ने के लिए मजबूर किया है, बहुअर्थी था। वैसे द्रमुक का रिकॉर्ड पहले भी सरकार को दबाव में लाने और फिर पीछे हटने का है। मसलन, मई 2009 में सात संासदों को मंत्री बनाने को लेकर करुणानिधि ने दबाव बनाया और मनमोहन सिंह को इसे स्वीकार करना पड़ा। अक्टूबर-नवंबर 2008 में श्रीलंका सरकार द्वारा तमिलों के खिलाफ सैनिक कार्रवाई के मामले पर केंद्र को साफ अल्टीमेटम दिया गया कि अगर सरकार तमिलों की हत्या नहीं रोक पाती तो वह सरकार से बाहर हो जाएगी। संप्रग प्रथम सरकार गठन के समय भी करुणानिधि ने बयान दे दिया था कि कैबिनेट में मुंहमांगा विभाग नहीं मिलने पर उसके सांसद मंत्रिमंडल से बाहर ही रहेंगे। उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया। ऐसा ही इस बार भी हुआ, किंतु हम जानते हैं कि मौजूदा परिस्थितियां भिन्न हैं। ऐन चुनाव से पहले ए राजा की गिरफ्तारी और करुणानिधि के घर तक सीबीआइ का पहुंचना उसके नेताओं के लिए असह्य है। इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि सीट बंटवारे के मतभेद को संबंध विच्छेद करने की सीमा तक ले जाकर द्रमुक ने कांग्रेस के साथ अपना रोष अभिव्यक्त किया। समझौते के बावजूद हमें इस घटना को कांग्रेस-द्रमुक रिश्ते के भविष्य के सूचक के तौर पर देखना होगा। यह कहना ठीक नहीं है कि तमिलनाडु की राजनीति में इस समय दोनों के तलाक से केवल द्रमुक को ही हानि होती। एक समय अन्नाद्रमुक प्रमुख जयललिता ने अवश्य घोषणा की थी कि द्रमुक के समर्थन वापसी की अवस्था में वह सरकार को समर्थन देगी, लेकिन विधानसभा चुनाव में उसका गठबंधन पूर्ण हो चुका है और उसमें कांग्रेस के लिए सम्मानजनक स्थान नहीं है। कांग्रेस यदि अकेले जाती तो उसे बिहार का हश्र ही प्राप्त हो सकता था। ऐसा करने का कोई राजनीतिक औचित्य नहीं था। एक ओर भ्रष्टाचार पर हमला झेल रही सरकार चुनाव में बुरे हश्र की निराशा नहीं झेलना चाहती थी। निस्संदेह कांग्रेस ने संकट प्रबंधन के तौर पर सपा के मुलायम सिंह यादव या ऐसे दूसरे नेताओं से बातचीत आरंभ कर दिया और इससे जो संदेश निकला, उसने भी द्रमुक को पुनर्विचार करने पर विवश किया। केवल तीन सीटें और कुछ विधानसभा क्षेत्र बदलने की मांग पर गठबंधन से अलग होने का कदम वैसे ही गले नहीं उतर सकता। जाहिर है, द्रमुक ने रणनीति के तहत कांग्रेस पर चोट करने की रणनीति अपनाई थी। उसे भी समय की नजाकत का अहसास था और है। ऐसे समय जब 2जी स्पेक्ट्रम भ्रष्टाचार की आंच उसके घर तक प्रवेश कर चुकी है, वह सरकार से बिल्कुल अलग होने का खतरा उठाने से बचना चाहेगी। सरकार में होने के राजनीतिक लाभ से वंचित होने का व्यावहारिक अर्थ इस समय वह समझती है। दूसरी ओर कांग्रेस भी तमिलनाडु चुनाव के मद्देनजर अतिवाद से बचना चाहती थी, किंतु इसे द्रमुक की पराजय या कांग्रेस की विजय के रूप में देखना गलत है। हमें इस राजनीतिक हकीकत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि बसपा या सपा कभी भी संप्रग में खासकर कांग्रेस के संदर्भ में द्रमुक का स्थान नहीं ले सकती। वस्तुत: कांगे्रस के लिए द्रमुक की भरपाई तत्काल संभव नहीं। द्रमुक संप्रग में कांग्रेस की सहज साझेदार है, जबकि बसपा या सपा हमेशा असहज साझेदार होंगे। तमिलनाडु में द्रमुक-कांग्रेस चुनाव में भी एक पक्ष हैं। ठीक इसके विपरीत सपा एवं बसपा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव मैदान में उतरेंगे। ये सरकार का साथ तभी तक दे सकते हैं, जब तक कि इन्हें रणनीतिक तौर पर कुछ लाभ हो। यानी आय से अधिक संपत्ति के मामले में केंद्र सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई तेज न करके इनका समर्थन ले सकती है। इस प्रकार ये दूसरी कई प्रकार की शर्ते कांग्रेस पर लाद सकते हैं। किंतु अपना जनाधार खोने का जोखिम कोई नहीं उठा सकता। वैसी स्थिति पैदा होने पर समर्थन कभी भी वापस हो सकता है। वैसे भी बसपा सरकार में जाने को तैयार न थी, न आगे होगी। उत्तर प्रदेश का आम कांग्रेसी कार्यकर्ता इन दोनों पार्टियों के साथ समझौते के ही खिलाफ है। कांग्रेस नेतृत्व यदि प्रदेश पार्टी के आम मनोविज्ञान के खिलाफ ऐसा करता या आगे करेगा तो इसका परिणाम कतई अच्छा नहीं होगा। हम तात्कालिक तौर पर भले जो राजनीतिक अर्थ निकालें, लेकिन कांग्रेस के लिए भी इन दोनों दलों के साथ समझौता करना कठिन और राजनीतिक तौर पर बहुत बड़ा जोखिम था और रहेगा। एक और महत्वपूर्ण बात यह कि कांग्रेस संप्रग में इस समय किसी किस्म की फूट का संकेत देना नहीं चाहती थी। इससे विपक्षी दलों को उसके खिलाफ मुद्दा मिल जाता। इसलिए जो कुछ हुआ, वह दोनों की मजबूरी थी। कुल मिलाकर यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि इस घटना ने संप्रग की स्थिरता पर सवाल खड़ा कर दिया है। वर्तमान समझौते के बावजूद द्रमुक-कांग्रेस के रिश्ते अब सामान्य नहीं हैं। द्रमुक की उच्चाधिकार समिति की बैठक के बाद का माहौल बता रहा था कि समर्थन वापसी के निर्णय से सभी खुश थे। इसमें तत्काल दोनों की मजबूरी के कारण भले बीच का रास्ता निकल गया, कांग्रेस द्रमुक संबंध हमेशा अनिश्चय के घेरे में रहेगा। द्रमुक-कांग्रेस संबंध पर विचार करते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दोनों का अंतिम रुख चुनाव परिणाम पर निर्भर करेगा। यदि द्रमुक सत्ता से वंचित होती है, जिसकी संभावना प्रबल है तो कांग्रेस का व्यवहार उसके प्रति कैसा होगा, यह कहना कठिन है। वैसे भी मन में यदि दरार पड़ जाए तो फिर संबंध कभी प्रगाढ़ नहीं हो सकते और यहां ऐसा हो चुका है। इसलिए आगे क्या होगा, कोई नहीं कह सकता। हां, कांग्रेस के लिए भी निर्णय करना कठिन होगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

यादों के नश्तर


जब मैंने मेनका गांधी की मां अमतेश्वर आनंद की मृत्यु के बारे में सुना तो मुझे लगा कि जैसे किसी ने मेरे सीने में छुरा भोंक दिया हो। कभी हम एकदूसरे के बहुत निकट थे। फिर हमारे बीच कड़वाहट हो गई और हमने एकदूसरे को कभी नहीं देखा। कुछ पत्रकारों ने अमतेश्वर और मेरे संबंधों में आई कड़वाहट के संबंध में मेरा इंटरव्यू लेना चाहा, लेकिन मैंने उनसे मिलने से मना कर दिया। जो भी हो, मैंने सोचा कि अगर मैं अपने पिछले पारिवारिक संबंधों के बारे में लिखता हूं तो इसमें कुछ नुकसान नहीं होगा। पहले विश्व युद्ध के बाद अमतेश्वर के पिता और मेरे पिता सुजान सिंह को कृषि भूमि मिली थी जिसे मोंटगुमरी जिला कहा जाता था। उनके पिता दातार सिंह पशुपालन में लग गए। मेरे दादा सुजान सिंह भी खेती करने लगे। उन्होंने ट्रैक्टर और हारवेस्टर जैसी नई तकनीके इस्तेमाल में लाने की कोशिश की। वह आधुनिक तरीके से खेती करके जमीन से भरपूर फायदा उठाने के कायल थे। मिंया छन्नू और खानेवाल के बीच एक रेलवे स्टेशन में अभी भी उनका नाम कोटि सुजान सिंह है। उन्होंने एक कपास की फैक्टरी भी लगाई जो उनके पिता इंदर कॉटन फैक्टरी के नाम पर थी। दोनों परिवार समृद्ध हुए। पशुपालन में सुधार के लिए अंग्रेज सरकार ने दातार सिंह को नाइटहुड की उपाधि दी। मेरे दादा को सरकार साहिब का खिताब मिला। मैं समझता हूं कि मेरे चाचा उज्जल सिंह और पिता सुजान सिंह ने अवश्य ही इस मौके पर पंजाबी कहावत गढ़ी होगी, जो इस तरह से है - बन गया सर दातर, मंझा चरा के मोह लई सरकार, गप्पां मार-मार के विभाजन के बाद मोंटगुमरी साहीवाल बन गया और अब वहां केवल एक रेलवे स्टेशन है, जहां कुछ गाडि़यां रुकती हैं। गालिब का पसंदीदा शेर : एक शाम मैं अपने मेहमानों को गालिब का लिखा सुना रहा था। एक युवा महिला ने पूछा कि गालिब का कौन सा शेर मेरा पसंदीदा है? अविलंब मैंने वह सुना दिया- इश्क ते तबियत ने जीस्त का मजा पाया दर्द की दवा पाई दर्द बेदवा पाया मैंने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया पर उससे मैं खुश नहीं था और उसमें सुधार करने की कोशिश कर रहा था। तभी मेरा नौकर बहादुर उर्दू और हिंदी में गालिब की शायरी की एक किताब ले आया। उसने कहा कि कोई सज्जन यह किताब लाए हैं और आपसे मिलना चाहते हैं। हालांकि मैं किसी से बिना समय निश्चित किए नहीं मिलता, लेकिन मुझे लगा कि इस संयोग के पीछे कुछ छिपा हुआ है। मैंने बहादुर से उस व्यक्ति को अंदर लाने के लिए कह दिया। इस तरह पब्लिशर इलस्ट्रेटर और केलिग्राफर नसरुद्दीन अमरजीत से मेरी मुलाकात हुई। मैंने उनसे पूछा कि क्या इसमें मेरा मनपसंद शेर है। उन्होंने अफसोस जाहिर किया कि उन्होंने इसे शामिल नहीं किया है। मैंने किताब के पन्ने पलटे, सुंदर केलिग्राफी, लेकिन चित्र अच्छे नहीं थे। उन्होंने अपने बारे में मुझे कुछ बताया। उनका जन्म दाउदी बोहरा परिवार में हुआ था। उनकी मातृभाषा गुजराती है। उन्होंने स्कूल और कॉलेज में अंग्रेजी और उर्दू सीखी और 29 साल तक सरकारी नौकरी की। इसके बाद वह कोलकाता चले गए और अब वहीं रहते हैं। मैंने उनसे पूछा कि क्या कभी उन्होंने अपनी किताब बेचने की कोशिश की। उन्होंने जवाब दिया कि अब ऐसा करूंगा यह पहली कृति है। मैंने पूछा, आप इसकी कितनी कीमत रखेंगे? उन्होंने बताया कि 1200 रुपये है, लेकिन आपके लिए यह मेरा उपहार है। मैंने कहा, यह उपहार नहीं होगा यह आपकी पहली बिक्री होगी। मैंने अपने नौकर बहादुर से 1200 रुपये लिए और उनके हाथ में थमा दिए। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)