विगत पांच दिनों से रेल की समयसारणी को पूरी तरह गड़बड़ा देने और लाखों यात्रियों को अचानक अपनी यात्रा रद्द करने के लिए मजबूर करने वाला तथा रेल मंत्रालय को हर रोज करोड़ों को नुकसान पहुंचाने वाला जाटों का आंदोलन अभी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। केंद्रीय सेवाओं में पिछड़ी जातियों के लिए मिले आरक्षण में खुद को भी हिस्सेदार बनाने की मांग के साथ जाट आरक्षण संघर्ष समिति के आह्वान पर हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा आसपास के अन्य इलाकों से शुरू जाटों का यह आरक्षण आंदोलन तेज हो गया है। खबरों के मुताबिक समिति के पदाधिकारियों और केंद्रीय कैबिनेट सचिव के बीच होने वाली बातचीत जाट नेताओं की नई शर्त के कारण नहीं हो सकी, जिसमें उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को भी साथ ले जाने की बात कही गई थी। इस बीच जाट नेताओं ने केंद्र सरकार की अर्थी निकाल कर उसे पूरे ट्रैक पर घुमा कर उसका दाहसंस्कार भी किया। संघर्ष समिति का तर्क सीधा है कि अगर राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के स्तर पर उन्हें पिछड़ी जाति मान लिया गया है तो आखिर केंद्र सरकार क्यों आनाकानी कर रही है। इसे आप वोट की राजनीति का दबाव कहें या उनके रुख में आया परिवर्तन, मगर विभिन्न राज्य सरकारों ने भी जाटों की इस मांग का समर्थन किया है। पिछले साल जब जाट आरक्षण की अपनी मांग को लेकर सड़कों पर थे और उन्होंने उत्तर प्रदेश से दिल्ली जाने वाली जल आपूर्ति रोकने की बात कही थी, उस वक्त मुख्यमंत्री मायावती ने उनके आंदोलन को अपना नैतिक समर्थन दिया था और कहा था कि उन्हें दिल्ली सरकार पर जोर डालना चाहिए। यही हाल हरियाणा की वर्तमान सरकार का है, जिसकी विधानसभा ने इस संबंध में प्रस्ताव पारित कर उसे केंद्र सरकार के पास भेज दिया है। प्रश्न उठता है कि अपने आप को पिछड़ा साबित करने की जाट समुदाय की मांग के पीछे का तर्क क्या है? इसे समझने के लिए हम मंडल आयोग की सिफारिशों पर गौर कर सकते हैं, जिसका गठन वर्ष 1978 में मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्व वाली जनता पार्टी सरकार ने संविधान की धारा 340 के तहत किया था। अन्य पिछड़ी जातियों में सामाजिक एवं शैक्षिक तौर पर पिछड़ी किन जातियों को शामिल किया जा सकता है, इसके लिए उसने एक लंबी कवायद की थी। और लगभग चार हजार जातियों को सामाजिक एवं शैक्षिक आधार पर पिछड़ा घोषित किया था। गौरतलब है कि अपने विस्तृत अध्ययन के आधार पर मंडल आयोग ने अपनी फेहरिस्त में जाटों को शामिल नहीं किया था। वर्ष 1980 में ही सरकार के सामने पेश इस रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 1989 में तत्कालीन वीपी सिंह सरकार ने केंद्र सरकार की नौकरियों में पिछड़ों के लिए आरक्षण की घोषणा की थी। सोचने का मसला है कि आखिर किस आधार पर मंडल आयोग ने जाटों को पिछड़ी जाति में शामिल नहीं किया था। दरअसल, आयोग ने जरूरी आंकड़े और सबूत पाने के लिए कई पद्धतियों व तकनीक को अपनाया था, जिसके तहत स्थूल रूप में 11 पैमाने थे, जिन्हें सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक हिस्सों में बांटा गया था। ध्यान देने योग्य है कि सभी पैमानों के लिए समान वेटेज नहीं दिया गया था, सामाजिक सूचकांकों के लिए जहां तीन पाइंट वेटेज था तो शैक्षिक पिछड़ापन के लिए 2 पाइंट। वहीं आर्थिक के लिए 1 पाइंट वेटेज था। सामाजिक स्थिति के आकलन के तहत पहले दो बिंदु थे- ऐसी जातियां-वर्ग, जिन्हें अन्य जातियां सामाजिक तौर पर पिछड़ा मानती हैं तो दूसरा बिंदु था, ऐसी जातियां या वर्ग, जो मुख्यत: अपने जीवनयापन के लिए शारीरिक श्रम पर निर्भर रहते हैं। शैक्षिक पैमानों के अहम बिंदु थे, ऐसी जातियां-वर्ग, जहां 5-15 साल की उम्र के बच्चे, जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा हो, उनका अनुपात राज्य औसत से 25 फीसदी अधिक हो तथा जाति-वर्ग विशेष के ऐसे बच्चे, जो 5-15 साल की उम्र के बीच स्कूल छोड़ जाते हों, उनकी संख्या राज्य औसत से 25 फीसदी अधिक हो। आर्थिक पैमानों के तहत प्रमुख बिंदु था पारिवारिक संपत्ति का औसत मूल्य राज्य औसत से कम से कम 25 फीसदी कम हो तथा कच्चे घरों में रहने वाले जाति विशेष के लोगों की संख्या राज्य औसत से 25 फीसदी अधिक हो। क्या यह तर्क करना उचित होगा कि वर्ष 1980 में जाट सामाजिक एवं आर्थिक तौर पर पिछड़े नहीं थे, मगर विगत तीस सालों में उनके सामाजिक आर्थिक सूचकांकों में तेजी से गिरावट आई है, ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिखता। आजादी के पहले जाटों को भले ही शूद्र जातियों में ही शुमार किया जाता था, मगर आजादी के साठ साल बाद की स्थिति पर गौर करें तो साधारण व्यक्ति भी देख सकता है कि जाटों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में कितना परिवर्तन आया है। पंजाब-हरियाणा जैसे सापेक्षत: छोटे सूबों की राजनीति और जमीन के अच्छे-खासे हिस्से पर यहां तक कि तमाम शैक्षिक संस्थानों आदि पर इसी जाति का दबदबा है। यही हाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश का है। राजधानी दिल्ली के तहत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लगातार होते जा रहे विस्तार के चलते तथा इसके तहत दिल्ली के आसपास जमीन की बढ़ती कीमतें आदि के चलते पहले से ही जमीनों के अच्छे-खासे हिस्से पर नियंत्रण के चलते उनकी आर्थिक स्थितियों में भी इन क्षेत्रों में जबरदस्त उछाल आया है। निश्चित ही सवाल वास्तविक पिछड़ेपन का नहीं है, बल्कि चुनावी राजनीति के तकाजों का बखूबी इस्तेमाल करते हुए अपने आप के लिए नौकरियों में भी अधिकाधिक स्थान हासिल करने का है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समुदाय विशेष द्वारा अपनी बेहतरी के लिए जो दबाव की राजनीति की जाती है, यह उसी का एक प्रतिफल है। कल्पना की जा सकती है कि अगर जाटों की यह मांग मान ली गई तो इसका असर अन्य वास्तविक पिछड़ी जातियों के अवसर पर अवश्य पड़ेगा। मंडल आयोग की संस्तुतियों के संदर्भ में एक बात अक्सर भुला दी जाती है, वह है सुप्रीम कोर्ट का 1992 को इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार का वह फैसला, जिसके तहत उसने आदेश दिया था कि केंद्र व राज्य सरकारों को चाहिए कि वह स्थायी आयोगों का गठन कर इसके लाभार्थियों की निरंतर पड़ताल करें। न्यायमूर्ति टीके थोम्मन ने कहा था, पिछड़ेपन की पहचान दरअसल समावेश व बहिष्करण की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। आरक्षण के संवैधानिक संरक्षण के लिए योग्य नागरिकों के तबकों को निरंतर पहचानते, छांटते रहना पड़ेगा ताकि अपात्र को इसका लाभ न मिले। इन प्रस्तावित आयोगों को अर्द्ध-न्यायिक इकाइयों के तौर पर देखा गया था, जो अपने कामकाज को राजनीतिक प्रभावों के वातावरण से दूर रखकर संचालित करेंगे। वैसे मंडल आयोग ने जो पैमाने तय किए थे, उसके पहली दफा उल्लंघन का जिम्मा बीसवीं सदी के आखिरी वर्षो में केंद्र में आई अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को जाता है। राजस्थान में कांग्रेस के जाट जनाधार को अपनी तरफ खींचने के लिए 1999 के लिए लोकसभा के चुनावों के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने जाटों को आरक्षण देने का वादा किया था, जिसका उन्हें काफी लाभ मिला। इसके लिए एक कमजोर-सा तर्क यह दिया गया कि शिवशंकर के नेतृत्व वाले नेशनल कमीशन ऑन बैकवर्ड क्लासेस द्वारा तैयार नवंबर 1997 की एक रिपोर्ट को आधार बनाया, जिसने राजस्थान में जाटों को पिछड़ी जाति का लाभ दिलाने की बात कही थी। अपने वोट बैंक में लगी सेंध से घबराई कांग्रेस ने चुनावों के तत्काल बाद राज्य के पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों का इंतजार किए बिना जाटों को आरक्षण दे दिया और उसके बाद जो खेल शुरू हुआ, उसकी परिणति अभी हमारे सामने है। अंत में, क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि आरक्षण को लेकर जारी वर्तमान उठापटक को लेकर संविधान निर्माताओं की क्या प्रतिक्रिया होती? संविधानसभा के अध्यक्ष डॉ अंबेडकर इस बात को देखकर निश्चित ही विचलित हो उठते कि सामाजिक एवं शैक्षिक तौर पर उत्पीडि़त तबकों को समान अवसर प्रदान करते हुए शिक्षा व रोजगार में आरक्षण प्रदान करने की जो नीति अपनाई गई थी, वह गणतंत्र की साठ साला यात्रा के बाद अपने बिल्कुल विपर्यय के रूप में किस तरह सामने आ रही है। ऐसी जातियां-ऐसे तबके अपने लिए विशेष अवसरों की मांग करेंगे, जो आर्थिक, सामाजिक रूप में कहीं से पिछड़े नहीं कहे जा सकते हैं और राजनीतिक स्तर पर भी उनकी सादृश्यता अपनी संख्या के अनुपात में काफी अधिक बनी हुई है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Thursday, March 10, 2011
सामाजिक अपराधों का स्पेक्ट्रम
युवा पीढ़ी के सामने असमंजस की जो स्थिति आज बनी है उसका पिछले साठ सालों में दूसरा समकक्ष उदाहरण केवल आपातकाल का ही दिया जा सकता है। उस समय भी एक बड़ा प्रश्न उभरा था कि क्या जनतांत्रिक मूल्यों का क्षरण अपनी चरम अवस्था में पहुंच गया है? क्या इसे रोककर उन मूल्यों की पुनस्र्थापना हो सकती है? प्रयास तो युवाओं ने ही किया था और वे असफल नहीं रहे। आज शायद उससे भी विकट स्थिति उनके समक्ष दिखाई दे रही है। क्या उन्हें अपना जीवन भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगाकर ही जीना पड़ेगा? जो आदर्श सदा ही युवाओं के मन-मानस में पनपते रहे हैं और जो मूल रूप से तथा मुख्य रूप से मानव सभ्यता के विकास के लिए उत्तरदायी रहे हैं उनका वर्तमान युवा पीढ़ी के सामने क्या हश्र दिखाई देगा? जो पीढ़ी सत्ता में है, अधिकार युक्त है, साधन संपन्न है वह मूल्यों, आस्थाओं, आचरण तथा नीतियों से जिस बेशर्मी से खिलवाड़ कर रही है वह तो विरले तानाशाहों के अंधे शासनकाल में ही देखा जा सका है। आज भी लोग मेहनत कर रहे हैं, नेतृत्व दे रहे हैं, मगर उसकी दिशा बदल गई है। उनका सिद्धांत है जब तक सत्ता हाथ में है, प्रभामंडल है, देश से जो भी नोचा-खसोटा जा सकता है वही करना है, वही कर्तव्य है। यह समय घोटालों की संख्या गिनने का नहीं है। जो आज भी संयम का मूल्य आधारित जीवन जीना चाहते हैं उनके रास्ते हर क्षेत्र में दूभर हैं। महात्मा गांधी के सत्तासीन उत्तराधिकारियों ने मूल्यों तथा सिद्धांतों का हर दृष्टिकोण से हनन किया है। गांधीजी को अपने अंतिम वषरें में इसका अहसास तथा आभास हो गया था। वे पहले से भी सशंकित थे और समय-समय पर अपने भाषणों तथा लेखों से सामान्यजन को आगाह करते रहते थे। हिंद स्वराज्य में उन्होंने जिस समाज की संकल्पना की थी उसमें शोषण यदि पूरी तरह समाप्त न होता तो भी न्यूनतम स्तर पर तो आ ही जाता। आज यह दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है तथा सामान्य व्यक्ति के लिए जीवन को असत्य तथा नारकीय बना रहा है। इंडिया शाइनिंग तथा इंडिया एराइब्ड जैसे नारों का भारत के 90 प्रतिशत लोगों के लिए कोई अर्थ नहीं है। गांवों में सामाजिक संबंधों का विघटन एक सामान्य प्रक्रिया बन गया है। चुनावी प्रक्रिया ने सबसे बड़ा काम अनेक प्रकार की सामाजिक दरारें पैदा करने का किया है। जो युवा गांव से शहर आ रहे हैं उनमें से अधिकांश अपना रास्ता ढूंढ नहीं पाते हैं तथा निराशा और हताशा के अंधकार में खो जाते हैं। वे जो चकाचौंध यहां देखते हैं उसका हिस्सा बनने की स्वाभाविक इच्छा उन्हें पथ-भ्रमित ही अधिक करती है। 1925 में यंग इंडिया में गांधीजी ने सात भयानक पापों की सूची दी थी। इन्हें आज के परिदृश्य में देखने-समझने की फुर्सत कम से कम नेताओं में तो नहीं ही दिखाई पड़ती है। सामाजिक तथा राजनीतिक परिदृश्य से यह सातों जुड़ते हैं। बिना काम किए धन संपत्ति अर्जन-आज कितना कुछ विघटन कर रहा है। गांधीजी ने चित्तशुद्धि के बिना आनंद को पाप माना था। अकूत धन संपत्ति लोगों को क्या वास्तव में आनंद दे पाती है, लोग ऐसा भ्रम अवश्य पालते हैं और खूब पालते हैं। संभवत: इसका मुख्य कारण अज्ञान तथा समझने की कमी या अनिच्छा को ही माना जाना चाहिए। सभी के लिए बेसिक शिक्षा का सपना देखने वाले महात्मा ने चरित्र के बिना ज्ञान को पाप माना था। आज बड़े से बड़े घोटाले तथा भ्रष्टाचार में ऊंची शिक्षा प्राप्त व्यक्ति ही आगे बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। देश की जेलों में सबसे अधिक गरीब असभ्य तबके के लोग ही दिखाई देंगे। न्याय व्यवस्था तो उन्हीं के लिए है जो लाखों करोड़ों खर्च कर सकें। लाखों किसान आत्महत्या कुछ वषरें में कर चुके हैं, सिलसिला रुकने का नाम नहीं लेता। मंहगाई पर सभी ने हथियार डाल दिए हैं। क्या इसका मुख्य कारण नैतिकता विहीन व्यापार नहीं है? गांधी जी ने इन चार के अतिरिक्त तीन और घोर पापों की बात कही थी-मनुष्यता विहीन विज्ञान, बिना सेवा किए धर्म तथा सिद्धांत-विहीन राजनीति। आज के सामाजिक परिदृश्य ने उनकी दूरदृष्टि की सार्थकता सिद्ध कर दी है। सारा विश्व गांधी के विचारों पर पहले से अधिक विचार-विमर्श आज कर रहा है। भारत में ऐसा कुछ नहीं हो रहा है, विशेषकर राजनीतिक परिदृश्य में। सामान्यजन इस पर पुनर्विचार की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। इस बार 30 जनवरी को पहली बार देश के सौ से अधिक स्थानों पर लोग बड़ी संख्या में बाहर आए और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज उठाई। सिद्धांत-विहीन राजनीति ही देश की इस दुर्व्यवस्था के लिए उत्तरदायी है। यह गांधी का देश है तथा इसे अपना रास्ता तय करने केलिए प्रेरणा तथा मार्गदर्शन गांधी से ही लेना होगा। इसी के आधार पर देश के युवा वर्ग से ही नया नेतृत्व उभरेगा तथा वही आगे के लिए लोगों को संगठित करेगा। यह आवश्यक नहीं है कि वह राजनेताओं में से ही हो। यह भारत में आध्यात्मिक तथा नैतिक मूल्यों के परीक्षण का समय है। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)
चुनाव सुधारों का दिखावा
चुनाव सुधार के लिए समूचे निर्वाचन तंत्र पर फिर से विचार किए जाने की जरूरत जता रहे हैं लेखक
भारत विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है। ग्रामसभा से लेकर लोकसभा तक सैकड़ों निर्वाचित पद हैं। प्रत्येक चुनाव में धांधली है, सत्तादल, बाहुबल और धनबल के नंगनाच हैं। कालेधन की ताकत ने जनतंत्र को कलंकित किया है। चुनाव सुधारों की बहस पुरानी है। केंद्र का न्याय और विधि मंत्रालय चुनाव आयोग के साथ मिलकर हाल में छह क्षेत्रीय बैठकें कर चुका है। अगले माह राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा ही विचार-विमर्श होना है। इसके बाद उम्मीदवारों का चुनाव खर्च उठाने के मुख्य मुद्दे पर विचार होगा। चुनाव खर्च देना संप्रग के न्यूनतम कार्यक्रम का मुख्य बिंदु है। बेशक चुनाव खर्चीले हैं। विधानसभा के छोटे क्षेत्र के भी चुनाव में 50 लाख से 2 करोड़ का खर्च देखा जा रहा है। लोकसभा के चुनाव करोड़ से 10 करोड़ के बीच लड़े जा रहे हैं। अब मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए दारू के साथ मोटी रकम का चलन भी बढ़ा है। आखिरकार लाखों करोड़ों की धनराशि आती कहां से है? बुनियादी सवाल यह है कि राष्ट्रमंडल खेल, 2-जी स्पेक्ट्रम जैसे महाघोटाले क्या चुनाव खर्च की गलियों से आते हैं और वहीं लौट जाते हैं? बढ़ा चुनाव खर्च सिर्फ एक मुद्दा है। दोष संपूर्ण राजनीतिक तंत्र में है, चुनाव प्रणाली में है, मुनाफाखोर राजनीतिक निर्णयों में है, हाईकमान के कब्जे वाले दलतंत्र में है। निष्पक्ष निर्वाचन जनतंत्र का प्राण है। संविधान सभा की मूल अधिकारों वाली समिति ने स्वतंत्र निर्वाचन को भारत के जन का मौलिक अधिकार बताया था। संविधान सभा ने निष्पक्ष चुनावों की महत्ता पर सहमति व्यक्त की, लेकिन इसे मूलाधिकार से भिन्न किसी अन्य अध्याय में रखने की बात तय हुई। भ्रष्टाचार निर्वाचन प्रणाली का कैंसर है। केएम मुंशी ने कहा कि उम्मीदवार ही भ्रष्टाचार नहीं करते, सरकारें भी भ्रष्टाचार कर सकती है। संविधान निर्माताओं की आशंका सच निकली, चुनाव प्रणाली भ्रष्ट हो चुकी है। सरकार द्वारा चुनाव खर्च का वहन नया मुद्दा नहीं है। इंग्लैंड, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा की सरकारें सीमित चुनाव खर्च उठाती हैं, उम्मीदवार चुनाव खर्च का पारदर्शी विवरण देने के लिए बाध्य हैं। अमेरिका में चुनाव का खर्च निजी क्षेत्र ही उठाते हैं, चंदे की धनराशि की सीमा है। चुनावी चंदे का पूरा विवरण व व्यय की मदों का सार्वजनिक किया जाना बाध्यकारी है। भारत में राज्य प्रायोजित चुनाव खर्च की बहस पुरानी है। चुनाव सुधारों पर 1990 में गठित दिनेश गोस्वामी समिति ने इसी तरह की सिफारिश की थी। विधि आयोग ने चुनाव सुधारों पर तैयार अपनी रिपोर्ट-1999 में आंशिक चुनाव खर्च की संस्तुति की थी। दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी ऐसी ही सिफारिश की थी। केंद्र के ऐसे ही प्रस्ताव पर चुनाव आयोग ने फरवरी 2006 में सभी दलों से विचार-विमर्श किया था। धनबल के दुरुपयोग को रोकने के सवाल पर सभी दल एक थे, लेकिन किसी निर्णय पर नहीं पहुंचे। आयोग दरअसल आमूलचूल परिवर्तन चाहता है। केंद्र दिखावे के लिए कुछ करने का श्रेय लेना चाहता है। केंद्र भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में है। संसद और विधानमंडल जनगणमन भाग्य विधाता हैं। ऐसे सदनों के सदस्यों का निर्वाचन पवित्र अनुष्ठान होता है। देश उनसे निष्पक्षता की उम्मीदें रखता है, लेकिन धनबल और बाहुबल के प्रभाव में चुनाव जीतने वाले संविधान और निर्वाचकों के प्रति जवाबदेह नहीं होते। वे सच्चे जनप्रतिनिधि नहीं होते। वे अपने आर्थिक श्चोतों और बाहुबली सहयोगियों के ही प्रतिनिधि होते हैं। चुनाव की स्टेट फंडिंग को काले धन के प्रभाव का विकल्प बताया जा रहा है, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी ने चुनाव सुधारों पर आयोजित एक गोष्ठी में स्टेट फंडिंग को खतरनाक प्रस्ताव कहा। कुरैशी के मत में सरकार की यह सहायता दलीय उम्मीदवार को पहले से उपलब्ध धन में ही वृद्धि करेगी। उन्होंने अपराधियों के चुनाव लड़ने को मुख्य मुद्दा बताया। असल में धनबल की समस्या के वास्तविक निदान के लिए पार्टियों द्वारा प्राप्त धन और उसे खर्च करने की विधि को भी पारदर्शी बनाना चाहिए। पूर्व चुनाव आयुक्त जेएम लिंग्दोह ने कॉमनवेल्थ विधि सम्मेलन में स्टेट फंडिंग को बेकार का प्रस्ताव बताया था। कुरैशी और लिंग्दोह की सोच व्यापक है, लेकिन सरकार की सीमित। चुनाव प्रणाली क्षेत्रवाद, वंशवाद, जातिवाद, धनबल और माफियावाद को खुलकर खेलने का अवसर देती है। इस प्रणाली में 15-20 दिन का प्रचार समय मिलता है। प्रत्याशी संसदीय क्षेत्र के सभी गांवों में नहीं जा सकता, विधानसभा प्रत्याशी भी प्रत्यक्ष जनसंवाद नहीं बना सकता। दल संगठन जमीनी नहीं हैं। ऐसे में धनबल और बाहुबल चमत्कार दिखाता है। सरकार चुनाव खर्च ही उठाना चाहती है तो अमेरिकी तर्ज पर सभी प्रत्याशियों को एक मंच पर क्यों नहीं लाती? सभा का खर्च सरकार उठाए, सबको अपना कार्यक्रम बताने का समान अवसर मिले। मतदान को अनिवार्य बनाए जाने पर भी विचार होना चाहिए। समूची चुनाव प्रणाली को ईमानदार बनाए जाने की आवश्यकता है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के लिए विख्यात हैं। भारत भी निर्वाचन प्रणाली को स्वतंत्र और निष्पक्ष क्यों नहीं बना सकता? समूची चुनाव प्रणाली पर समग्र विचार की आवश्यकता है। 20-25 प्रतिशत वोट पाने वाले विधायक सांसद अपने क्षेत्र के सच्चे प्रतिनिधि नहीं हो सकते। 51 प्रतिशत से कम वोट पाने वाले प्रतिनिधियों के क्षेत्रों में उसी सप्ताह प्रथम और द्वितीय उम्मीदवारों के मध्य दोबारा चुनाव करवाने का कानून क्यों नहीं बनाया जा सकता? राज्यों के सत्तादल विधानसभा चुनावों में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करते हैं। विधानसभा चुनाव के छह माह पूर्व ही विधानसभा को भंग कर राष्ट्रपति शासन के अधीन चुनाव आयोग की सिफारिश पर चलने वाली राज्यपाल नियंत्रित कामचलाऊ सरकार क्यों नहीं चलाई जा सकती? संविधान के अनुच्छेद 324(6) में आयोग के अनुरोध पर राज्यपाल पर चुनाव के लिए जरूरी कर्मचारी वर्ग उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। इसी खंड में संशोधन करते हुए राज्य की समूची नौकरशाही को चुनाव के पहले आयेाग के नियंत्रण में किया जा सकता है। राजनीतिक दल ही जनतंत्र की पाठशाला हैं। जो दल अपने आंतरिक संगठनों के चुनाव भी ईमानदारी से नहीं करवा सकते, उनसे निर्वाचनों में आदर्श चुनाव संहिता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? दलों के आंतरिक चुनाव भी आयोग के नियंत्रण में होने चाहिए। राजकोष के लुटेरे दलतंत्र को ठीक कीजिए। दिखावे से कुछ नहीं होगा, समग्रता में विचार का कोई विकल्प नहीं होता|
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