Showing posts with label पृ. सं.८. Show all posts
Showing posts with label पृ. सं.८. Show all posts

Saturday, July 9, 2011

मीडिया से नाराजगी

प्रधानमंत्री के मीडिया के प्रति दुराग्रह पर  लेखक की टिप्पणी
पिछले दिनों संपादकों के साथ बातचीत के दौरान शायद अनजाने में ही प्रधानमंत्री ने मीडिया के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त कर दी। उन्होंने कहा कि मीडिया ने कई मामलों में आरोप लगाने, खुद सुनवाई करने और स्वयं ही जज होने की भूमिका अपना ली है। वास्तव में सच्चाई इससे कोसो दूर है। मनमोहन सिंह जबसे संप्रग-2 के प्रधानमंत्री बनें हैं सब कुछ उलटा-पुलटा दिखाई दे रहा है। मुझे अनायास ही इंदिरा गांधी के जमाने की बात याद आती हैं। 1971 में बांग्लादेश में भारी विजय प्राप्त करने के बाद इंदिरा गांधी की पूरे भारत में जयजयकार हो रही थी। परंतु धीरे-धीरे माहौल बदलता गया। कई राज्यों में भ्रष्ट मुख्यमंत्रियों के कारनामे उजागर होने लगे। इंदिरा गांधी के कुछ चापलूस मंत्रियों तथा सलाहकारों ने उन्हें यह कहना शुरू कर दिया था कि मीडिया में भ्रष्टाचार की जो कहानियां उजागर हो रही हैं, वे सरासर झूठ हैं। पत्रकार विपक्षी दलों से मिले हुए हैं तथा सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं। इंदिरा गांधी ने इन बातों पर विश्र्वास कर लिया। 1975 में देश पर आपातकाल थोपने के बाद जयप्रकाश नारायण तथा मोरारजी देसाई और अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। सबसे बड़ी बात यह हुई कि प्रेस पर अंकुश लगा दिया गया। प्रेस का मुंह बंद हो जाने से इंदिरा गांधी का बड़ा नुकसान हुआ। सच्चाई उनके सामने आ ही नहीं पाती थी। उधर, आपातकाल की आड़ में राज्य सरकारें निरंकुश हो गईं और उनमें भ्रष्टाचार तेजी से पनपने लगा। इस देश में खुफिया एजेंसियां सदा से सुहाती बातें करती रही हैं। अर्थात जो इंदिरा गांधी और संजय गांधी को पसंद था वही खबरें उन तक पहुंचाई जाती थीं और उन्हें भरोसा दिलाया जाता था कि इमरजेंसी के कारण देश की आम जनता बहुत सुखी है। इसी गलत सूचना के कारण इंदिरा गांधी ने जब 1980 में आम चुनाव कराया और नतीजा सबके सामने हैं। इंदिरा गांधी ने बाद में यह सार्वजनिक रूप से कबूल किया कि समाचारपत्रों पर प्रतिबंध लगाकर उन्होंने बड़ी गलती की थी जिससे सच्ची खबरें उन तक पहुंच ही नहीं पाती थीं। शायद यही कारण था कि 80 के दशक में जब वह दोबारा सत्ता में आईं और एक प्रदेश में कांग्रेस सरकार ने प्रेस बिल लाकर समाचारपत्रों का मंुह बंद करना चाहा तो उन्होंने उस राज्य की सरकार को बहुत फटकारा और कहा कि वह प्रेस बिल वापस ले। उस राज्य सरकार को प्रेस बिल वापस लेना पड़ा। माना जाता है कि मीडिया एक आईना है जो राजनेताओं को सच्चाई से अवगत कराता है। यदि मीडिया नहीं होता तो वियेतनाम की लड़ाई का अंत नहीं होता। वियेतनाम की लड़ाई में अमेरिकी सरकार पानी की तरह पैसा फेंक रही थी और हजारों अमेरिकी युवक अकारण ही वहां मारे जा रहे थे। वाटरगेट की कहानी सबको मालूम है। यदि वाशिंगटन पोस्ट के संवादाता की चुस्ती नहीं होती तो निक्सन की कारगुजारियां प्रकाश में नहीं आतीं और उन्हें अंतत: त्यागपत्र नहीं देना पड़ता। पिछले कई महीने से 2-जी, कामनवेल्थ, आदर्श और न जाने कितने घोटालों की खबरें आए दिन समाचारपत्रों में आ रही हैं। लोग यह जानकर हैरान हैं कि सरकार कुछ करती क्यों नहीं है? एक बार जब प्रधानमंत्री ने कहा कि गठबंधन की लाचारी को समझना चाहिए, तब देश की जनता हैरान रह गई थी। मनमोहन सिंह की छवि निश्चय ही साफ-सुथरी है, लेकिन यह सच है कि न तो वह भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सके और न महंगाई पर काबू पा सके। ऐसे में यदि मीडिया भ्रष्टाचार की कहानियों को उजागर करता है तो इसमें भला नुकसान भी क्या है? आखिर देश की जनता सरकार से बड़ी है। मीडिया एक बार फिर से सरकार को आईना दिखा रहा है। यह सोचना गलत है कि मीडिया ही शिकायत करता है और वही जज बन बैठता है। सच तो यह है कि माीडिया आम जनता की भावना को उजागर कर रहा है। इस सत्य को समझना होगा। (लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं).

Friday, April 29, 2011

कांग्रेस पर कसता घेरा


मजबूत लोकपाल बिल और इसका मसौदा तैयार करने वाली समिति में नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग को लेकर अन्ना हजारे का आमरण अनशन शुरू होते ही संप्रग सरकार ने अप्रैल के पहले सप्ताह में उनके सामने घुटने टेक दिए। अन्ना के गांधीवादी, अहिंसक और अनुशासित प्रदर्शन ने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा और भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश को आंदोलित कर दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता के आक्रोश को कमतर आंकने वाली मनमोहन सरकार आंदोलन की जबरदस्त लोकप्रियता से हिल गई और उसने अन्ना की मांगों के सामने समर्पण करने में जरा भी देर नहीं लगाई। सरकार ने बिल का प्रारूप तैयार करने वाली दस सदस्यीय समिति के सदस्यों की घोषणा कर दी। एक बार संकट से निकलते ही कांग्रेस ने चालबाजियों का पिटारा खोल दिया। कांग्रेस नेताओं ने अन्ना हजारे और समिति के अन्य सदस्यों पर व्यक्तिगत रूप से निशाना साधना शुरू किया। महाराष्ट्र में धूल फांक रही एक आयोग की जांच रिपोर्ट को झाड़-पोंछ कर निकाला गया ताकि अन्ना हजारे को भी दागी सिद्ध किया जा सके। जांच रिपोर्ट के अनुसार, अन्ना हजारे ने अनधिकृत तौर पर एक जन्मदिन पार्टी में लाखों रुपये खर्च किए थे। येद्दयुरप्पा सरकार के खिलाफ संघर्षरत कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े पर आरोप लगाया कि वह प्रदेश में भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने कामयाब नहीं रहे। शांति भूषण और उनके बेटे को पहले एक सीडी के जरिए बदनाम करने की कोशिश की गई और बाद में इस आधार पर उनकी आलोचना की गई कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार से बेशकीमती जमीन कौडि़यों के भाव अपने नाम आवंटित कराई है। यही नहीं, अन्ना हजारे के खिलाफ अभियान छेड़ने से पहले उन्होंने बाबा रामदेव को निशाना बनाया, जिन्होंने स्विस तथा अन्य विदेशी बैंकों में भारतीय उद्योगपतियों व नेताओं के जमा काले धन को भारत लाने की मुहिम छेड़ रखी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कांग्रेस को इन प्रयासों का कुछ फायदा जरूर हुआ है। इससे निश्चित तौर पर अन्ना हजारे और उनकी टीम की छवि पर दाग लगा है। इस सफलता पर कांग्रेस पार्टी के कथित रणनीतिकार इतराते फिर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या भारत की सबसे पुरानी पार्टी, जिसने देश में भ्रष्टाचार का संस्थानीकरण किया है और जो अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार चला रही है, भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनरत कुछ लोगों पर कीचड़ उछाल कर देश के लोगों के मानस को बदल सकती है? कांग्रेस के नेताओं को खुद से पूछना चाहिए कि क्या इस पूरी कवायद से सरकार को रत्ती भर भी राहत मिली है? कांग्रेस और संप्रग सरकार अगर इस खुशफहमी में हैं कि भ्रष्टाचार विरोधियों पर हमले से उन्हें लाभ होगा तो वे भुलावे में हैं। जल्द ही उनकी खुशी काफूर होने वाली है। असलियत में, कांग्रेस पार्टी और संप्रग सरकार 2011 के उत्तरार्ध में और भी बड़ी मुसीबतों में फंसने जा रही हैं। इसके तीन प्रमुख कारण हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की गर्दन दबा रखी है और वह 2 जी स्पेक्ट्रम, हसन अली व विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मामलों में सरकार पर त्वरित व कारगर जांच का दबाव डाल रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में काम कर रही सीबीआइ और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नतीजे दिखाने शुरू कर दिए हैं। विकिलीक्स के जूलियन असांजे ने चेतावनी जारी की है कि किसी दिन स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीयों के काला धन जमा करने वाले खाताधारकों के नामों का खुलासा हो सकता है। और अंत में, विख्यात योग गुरु बाबा रामदेव, देश में जिनके लाखों अनुयायी हैं, ने सरकार को भ्रष्टाचार के अनेक मामलों पर कार्रवाई करने को मजबूर करने के लिए अपने एक लाख अनुयायियों के साथ दिल्ली के रामलीला मैदान पर सत्याग्रह शुरू करने की समयसीमा 4 जून तय कर दी है। उच्चतम न्यायालय भी सरकार की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है। इसने सरकार की दलीलों को मानने से इनकार कर दिया है और भ्रष्टाचार के सभी मामलों पर सरकार पर दबाव डाल रहा है। अदालत के दबाव ने सीबाआइ और ईडी को 2 जी स्पेक्ट्रम की तेजी से जांच करने को मजबूर कर दिया है और स्वान टेलीकॉम तथा कलैगनर टीवी को मिली मोटी रकम भी जांच के घेरे में है। इसने सरकार को राजस्व सचिव की अध्यक्षता में दस सदस्यीय उच्चाधिकार समिति का गठन करने को मजबूर किया है जो विदेशी बैंकों में जमा काले धन को भारत लाने के लिए उचित कदम उठाएगी। उच्चतम न्यायालय सरकार के रवैये से असंतुष्ट है। इसे लगता है कि जांच केवल हसन अली मामले तक सीमित है। सरकार की चिंता यह भी है कि जूलियन असांजे ने कहा है कि विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वालों के नामों का विकिलीक्स बम किसी भी दिन फट सकता है। उन्होंने कहा कि स्विस बैंकों में सबसे अधिक काला धन भारतीयों का जमा है। असांजे के अनुसार भारत सरकार इस मामले में कारगर उपाय नहीं कर रही है। यही नहीं, दोहरी कराधान संधि के कारण विदेशी बैंकों के खाताधारकों के नाम जाहिर न करने की भारत सरकार की दलील को भी उन्होंने थोथा करार दिया है, क्योंकि ये मामले कर चोरी के नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के हैं। इन बैंक खातों में घूसखोरी या फिर इसी तरह की अन्य अवैध कमाई जमा है। सब जानते ही हैं कि रिश्वत की कमाई पर कोई कर अदा नहीं करता। सरकार के जले पर नमक बाबा रामदेव ने छिड़क दिया है। उन्होंने 4 जून से दिल्ली में भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह करने की घोषणा कर दी है। उनकी अनेक मांगें हैं। इनमें अगस्त 2011 तक मजबूत लोकपाल बिल लाना, विदेशी बैंकों में जमा काले धन को तत्काल राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करना, यूएन कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन पर तुरंत हस्ताक्षर करना, 500 और 1000 के नोटों पर रोक लगाना और व्यवस्था के तमाम अंगों से ब्रिटिश राज के प्रावधान खत्म करना शामिल हैं। योगगुरु पिछले साल से भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाए हैं। बाबा रामदेव की छवि को कलंकित करने और उनकी समृद्धि पर सवाल उठाने के कांग्रेस पार्टी के हालिया प्रयास अभी तक कामयाब नहीं हुए हैं। वास्तव में, कांग्रेस या किसी भी अन्य पार्टी में रामदेव जैसा कोई नेता नहीं है, जिनके चाहने वाले देशभर में फैले हैं। अब योगगुरु ने फैसला किया है कि वह अपने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को 4 जून से नए जोशोखरोश से शुरू करेंगे। ये तमाम टाइम बम फटने ही वाले हैं और 24 अकबर रोड पर नेता अन्ना हजारे की टीम पर हमलों से मिले तुच्छ लाभ पर खुशी मना रहे हैं। विनाशकाले विपरीत बुद्धि इसी को कहते हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं).

Thursday, March 10, 2011

सामाजिक अपराधों का स्पेक्ट्रम


युवा पीढ़ी के सामने असमंजस की जो स्थिति आज बनी है उसका पिछले साठ सालों में दूसरा समकक्ष उदाहरण केवल आपातकाल का ही दिया जा सकता है। उस समय भी एक बड़ा प्रश्न उभरा था कि क्या जनतांत्रिक मूल्यों का क्षरण अपनी चरम अवस्था में पहुंच गया है? क्या इसे रोककर उन मूल्यों की पुनस्र्थापना हो सकती है? प्रयास तो युवाओं ने ही किया था और वे असफल नहीं रहे। आज शायद उससे भी विकट स्थिति उनके समक्ष दिखाई दे रही है। क्या उन्हें अपना जीवन भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगाकर ही जीना पड़ेगा? जो आदर्श सदा ही युवाओं के मन-मानस में पनपते रहे हैं और जो मूल रूप से तथा मुख्य रूप से मानव सभ्यता के विकास के लिए उत्तरदायी रहे हैं उनका वर्तमान युवा पीढ़ी के सामने क्या हश्र दिखाई देगा? जो पीढ़ी सत्ता में है, अधिकार युक्त है, साधन संपन्न है वह मूल्यों, आस्थाओं, आचरण तथा नीतियों से जिस बेशर्मी से खिलवाड़ कर रही है वह तो विरले तानाशाहों के अंधे शासनकाल में ही देखा जा सका है। आज भी लोग मेहनत कर रहे हैं, नेतृत्व दे रहे हैं, मगर उसकी दिशा बदल गई है। उनका सिद्धांत है जब तक सत्ता हाथ में है, प्रभामंडल है, देश से जो भी नोचा-खसोटा जा सकता है वही करना है, वही कर्तव्य है। यह समय घोटालों की संख्या गिनने का नहीं है। जो आज भी संयम का मूल्य आधारित जीवन जीना चाहते हैं उनके रास्ते हर क्षेत्र में दूभर हैं। महात्मा गांधी के सत्तासीन उत्तराधिकारियों ने मूल्यों तथा सिद्धांतों का हर दृष्टिकोण से हनन किया है। गांधीजी को अपने अंतिम वषरें में इसका अहसास तथा आभास हो गया था। वे पहले से भी सशंकित थे और समय-समय पर अपने भाषणों तथा लेखों से सामान्यजन को आगाह करते रहते थे। हिंद स्वराज्य में उन्होंने जिस समाज की संकल्पना की थी उसमें शोषण यदि पूरी तरह समाप्त न होता तो भी न्यूनतम स्तर पर तो आ ही जाता। आज यह दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है तथा सामान्य व्यक्ति के लिए जीवन को असत्य तथा नारकीय बना रहा है। इंडिया शाइनिंग तथा इंडिया एराइब्ड जैसे नारों का भारत के 90 प्रतिशत लोगों के लिए कोई अर्थ नहीं है। गांवों में सामाजिक संबंधों का विघटन एक सामान्य प्रक्रिया बन गया है। चुनावी प्रक्रिया ने सबसे बड़ा काम अनेक प्रकार की सामाजिक दरारें पैदा करने का किया है। जो युवा गांव से शहर आ रहे हैं उनमें से अधिकांश अपना रास्ता ढूंढ नहीं पाते हैं तथा निराशा और हताशा के अंधकार में खो जाते हैं। वे जो चकाचौंध यहां देखते हैं उसका हिस्सा बनने की स्वाभाविक इच्छा उन्हें पथ-भ्रमित ही अधिक करती है। 1925 में यंग इंडिया में गांधीजी ने सात भयानक पापों की सूची दी थी। इन्हें आज के परिदृश्य में देखने-समझने की फुर्सत कम से कम नेताओं में तो नहीं ही दिखाई पड़ती है। सामाजिक तथा राजनीतिक परिदृश्य से यह सातों जुड़ते हैं। बिना काम किए धन संपत्ति अर्जन-आज कितना कुछ विघटन कर रहा है। गांधीजी ने चित्तशुद्धि के बिना आनंद को पाप माना था। अकूत धन संपत्ति लोगों को क्या वास्तव में आनंद दे पाती है, लोग ऐसा भ्रम अवश्य पालते हैं और खूब पालते हैं। संभवत: इसका मुख्य कारण अज्ञान तथा समझने की कमी या अनिच्छा को ही माना जाना चाहिए। सभी के लिए बेसिक शिक्षा का सपना देखने वाले महात्मा ने चरित्र के बिना ज्ञान को पाप माना था। आज बड़े से बड़े घोटाले तथा भ्रष्टाचार में ऊंची शिक्षा प्राप्त व्यक्ति ही आगे बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। देश की जेलों में सबसे अधिक गरीब असभ्य तबके के लोग ही दिखाई देंगे। न्याय व्यवस्था तो उन्हीं के लिए है जो लाखों करोड़ों खर्च कर सकें। लाखों किसान आत्महत्या कुछ वषरें में कर चुके हैं, सिलसिला रुकने का नाम नहीं लेता। मंहगाई पर सभी ने हथियार डाल दिए हैं। क्या इसका मुख्य कारण नैतिकता विहीन व्यापार नहीं है? गांधी जी ने इन चार के अतिरिक्त तीन और घोर पापों की बात कही थी-मनुष्यता विहीन विज्ञान, बिना सेवा किए धर्म तथा सिद्धांत-विहीन राजनीति। आज के सामाजिक परिदृश्य ने उनकी दूरदृष्टि की सार्थकता सिद्ध कर दी है। सारा विश्व गांधी के विचारों पर पहले से अधिक विचार-विमर्श आज कर रहा है। भारत में ऐसा कुछ नहीं हो रहा है, विशेषकर राजनीतिक परिदृश्य में। सामान्यजन इस पर पुनर्विचार की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। इस बार 30 जनवरी को पहली बार देश के सौ से अधिक स्थानों पर लोग बड़ी संख्या में बाहर आए और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज उठाई। सिद्धांत-विहीन राजनीति ही देश की इस दु‌र्व्यवस्था के लिए उत्तरदायी है। यह गांधी का देश है तथा इसे अपना रास्ता तय करने केलिए प्रेरणा तथा मार्गदर्शन गांधी से ही लेना होगा। इसी के आधार पर देश के युवा वर्ग से ही नया नेतृत्व उभरेगा तथा वही आगे के लिए लोगों को संगठित करेगा। यह आवश्यक नहीं है कि वह राजनेताओं में से ही हो। यह भारत में आध्यात्मिक तथा नैतिक मूल्यों के परीक्षण का समय है। (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)

Thursday, February 24, 2011

प्रधानमंत्री की मजबूरियां


जूते भी खाए, प्याज भी खाया और जुर्माना भी दिया कहावत केंद्रीय सत्ता पर पूरी तरह से लागू होती है। पहले सरकार 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की विपक्ष की मांग पर राजी नहीं हुई, जिस कारण संसद के शीतकालीन सत्र में कामकाज नहीं हो सका। इसके बाद प्रधानमंत्री ने लोक लेखा समिति के समक्ष उपस्थिति के लिए पत्र लिखा और अब बजट सत्र से पहले संयुक्त संसदीय समिति के लिए तैयार हो गए। इसके पीछे भले ही यह तर्क दिया जा रहा हो कि सरकार बजट सत्र का वही हश्र नहीं होने देना चाहती जो शीतकालीन सत्र का हुआ है, लेकिन सच्चाई यह है कि संचार घोटाले के बाद घोटालों का जो पिटारा खुला उससे सरकार की विपक्ष का सामना करने की हिम्मत टूट गई और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं हुई कि वह मजबूर हैं। यद्यपि इस मजबूरी का ठीकरा उन्होंने गठबंधन की अपरिहार्यता पर फोड़ कर खुद को बचाने का प्रयास किया है, किंतु वास्तविकता यह है कि वह द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व इंग्लैंड के प्रधानमंत्री चैंबरलेन के समान कमजोर इरादे वाले प्रधानमंत्री साबित हो रहे हैं। सत्ता पक्ष के इन दावों में कोई दम नहीं है कि वह घोटालों की सीबीआई जांच कराकर भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कदम उठा रहा है। वास्तविकता यह है कि जांच जैसी कार्रवाई और पद से हटाने जैसे कदम तभी उठाए गए जब बच निकलने के सारे रास्ते बंद हो गए तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की स्वच्छ छवि तार-तार होने लगी। घोटाले के संदर्भ में सीधे प्रधानमंत्री पर आक्षेप पर अब विरोध के स्वर नहीं उठते। लोकसभा चुनाव के समय लालकृष्ण आडवाणी द्वारा मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री कहना जिन लोगों को बुरा लगा था, वही अब खुलेआम उनके कमजोर होने के प्रति सहमति जता रहे हैं। जो मीडिया उनके प्रति उदार था, मजबूरी जाहिर करने के बाद अब उसका रुख कटु हो गया है। इससे तो यही लगता है कि मनमोहन सिंह भले ही कार्यकाल पूरा करने का दावा करें, जनता यह मानने लगी है कि प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल का अंत निकट है। 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में संयुक्त संसदीय समिति के लिए सहमत होना सरकार की विवशता का परिचायक है। यह इस बात का भी परिणाम है कि बचाव के सारे रास्ते बंद होने के साथ-साथ न केवल प्रधानमंत्री बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर भी उंगली उठने लगी हैं। एक के बाद एक घोटालों और प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति पर उठ रहे सवाल सोनिया गांधी को भी लपेटे में ले रहे हैं। यह खुला रहस्य है कि भले ही प्रधानमंत्री का पद मनमोहन सिंह के पास हो, सत्ता की कुंजी तो सोनिया गांधी के हाथ में ही है। मनमोहन सिंह महज मोहरे हैं। मोहरे के रूप में उनकी छवि में जितना निखार आता जाएगा, सोनिया गांधी पर उतनी ही जवाबदेही बढ़ती जाएगी। संचार घोटाले के साथ-साथ इसरो समझौते पर, जो अब रद कर दिया गया है, सीधे प्रधानमंत्री की जवाबदेही बनती है। इसी के साथ मुख्य सतर्कता आयुक्त और मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को लेकर जो छीछालेदर हो रही है, उससे भी प्रधानमंत्री की छवि धूमिल हुई है। शायद इस स्थिति से ध्यान बंटाने के लिए ही उन्होंने मंत्रिमंडल में फेरबदल का पासा फेंका है और बजट सत्र के बाद और व्यापक फेरबदल की घोषणा की है। किंतु इस दिखावे से उनकी छवि में कोई सुधार नहीं हुआ है। जिस तरह चैंबरलेन ने हिटलर के सामने घुटने टेक दिए थे, उसी प्रकार मनमोहन सिंह भी हर उस समस्या के आगे घुटने टेक रहे हैं, जिससे देश की जनता त्रस्त है। ये समस्याएं प्रशासनिक तंत्र की असफलता उजागर करती हैं। शर्म-अल-शेख में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ जारी संयुक्त वक्तव्य से देश शर्मसार हो गया था। अमेरिका द्वारा भारत के अपमान की घटनाएं बढ़ती जा रही है। राजनयिकों को अपमानित करने के बाद एक अमेरिकी विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के पैरों में रेडियो कॉलर बांधने की घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि अमेरिका भारतीय नागरिकों के साथ अमानवीय व्यवहार कर रहा है। यह एक ऐसा मामला है जिस पर देशभर में गुस्सा फूट पड़ना चाहिए था, लेकिन कहीं भी इसके विरोध में रैली नहीं हुई। युवा संगठनों तक ने इसका संज्ञान इसलिए नहीं लिया क्योंकि देश का प्रधानमंत्री मजबूरी का इजहार कर स्वतंत्र देश के नागरिकों का स्वाभिमान कुचल चुका है। आज भारत के सामने समस्याओं का अंबार लगा है। ऐसे में कमजोर इरादों और आचरण वाले प्रधानमंत्री से उनके समाधान की आशा करना व्यर्थ है। नेतृत्व परिवर्तन की धारणा जोर पकड़ती जा रही है। देश के लिए यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। भारत को मजबूर नहीं मजबूत प्रधानमंत्री की जरूरत है और जैसाकि लालकृष्ण आडवाणी ने कहा है मनमोहन सिंह जितना कमजोर प्रधानमंत्री आज तक कोई नहीं हुआ। मनमोहन सिंह ने अपना कार्यकाल पूरा करने का दावा किया है। यदि उन्हें प्रधानमंत्री बने रहना है तो मजबूर नहीं मजबूत होना पड़ेगा। अन्यथा उन्हें पद छोड़ देना चाहिए। (लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)