वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े स्वामी असीमानंद के कबूलनामे के जरिए जांच एजेंसियां भले ही समझौता एक्सप्रेस धमाके की गुत्थी सुलझाने का दावा कर रही हों, लेकिन इसके साथ ही इस मामले पर एक नया सवाल भी उठ गया है। देश की सबसे प्रतिष्ठित फोरेंसिक लैब में नार्को जांच के दौरान सिमी के सरगना सफदर नागोरी ने माना था कि यह साजिश उसने रची है। असीमानंद के कबूलनामे के आधार पर जांच एजेंसियों ने समझौता धमाके की पूरी कहानी का खुलासा करने का दावा किया है, लेकिन समझौता धमाके की हरियाणा पुलिस की जांच से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि मार्च, 2008 में इंदौर से गिरफ्तार सिमी प्रमुख सफदर नागोरी ने साफ तौर पर माना था कि यह पूरी साजिश सिमी ने लश्कर-ए-तैयबा की मदद से रची। चार अप्रैल 2008 को मध्य प्रदेश की एक निचली अदालत से इजाजत लेने के बाद फोरेंसिक साइंस लैब (एफएसएल) बंगलूर में सफदर, कमरुद्दीन नागोरी और आमिल परवेज की नार्को जांच की गई। एफएसएल निदेशक बीएम मोहन ने 10 अप्रैल, 2008 को बताया था कि तीनों ने साढ़े चार घंटे के नार्को में कई अहम खुलासे किए। नागोरी ने इस काम में अपने सहयोगियों के नाम के साथ पूरे घटनाक्रम का ब्योरा दिया था। उसके मुताबिक एहतेसाम सिद्दीकी और अब्दुस्सुभान ने बम तैयार किया, जबकि लश्कर के आतंकी ने इंदौर से सूटकेस खरीदा जिसमें बम छुपाया गया। सिमी के ही एक कार्यकर्ता ने इस सूटकेस का कवर इंदौर से ही सिलवाया। पैसों के इंतजाम में सिमी की कोलकाता इकाई के प्रमुख मिस्बाउल इस्लाम और उसके एक साथी अब्दुल रजाक का योगदान रहा था। हालांकि नागोरी के इकबालिया बयान से भी जांच की गुत्थी पूरी तरह नहीं सुलझ सकी थी, क्योंकि जांच एजेंसियां इससे मेल खाने वाले साक्ष्य नहीं जुटा सकी थीं। अब एनआईए के सामने भी असीमानंद के कबूलनामे के मुताबिक साक्ष्य जुटाने की चुनौती है। असीमानंद को एक अन्य मामले की जांच कर रही दूसरी एजेंसी ने गिरफ्तार किया था।
Showing posts with label ९ जनवरी २०११. Show all posts
Showing posts with label ९ जनवरी २०११. Show all posts
Sunday, January 9, 2011
छोटे राज्यों के गठन का औचित्य
इस समय देश में छोटे राज्यों के गठन की मांग तेजी पकड़ रही है। कोई उत्तर प्रदेश का विभाजन कर बंुदेलखंड, पूर्वाचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश या यूं कहे कि हरित प्रदेश की मांग कर रहा है तो कोई आंध्र का विभाजन कर तेलंगाना और रॉयलसीमा के गठन की मांग कर रहा है। कोई विदर्भ, कोई गोरखालैंड, कोइ मिथिला, कोई विंध्याचल, कोई बोडोलैंड तो कोई कर्नाटक का विभाजन चाहता है और कोई जम्मू-कश्मीर को ही तीन हिस्सों में बांटने की मांग कर रहा है। जहां तक तेलंगाना की बात है तो श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट ने मामले को हल करने के बजाय और उलझा दिया है। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में छह सुझाव दिए हैं, जिनमें पहला सुझाव राज्य की यथास्थिति को बरकरार रखना है। दूसरा है आंध्र प्रदेश का दो भागों तेलंगाना और सीमांध्र में बंटवारा, जिनकी अलग राजधानियों की बात है और हैदराबाद को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की बात है। तीसरा है राज्य का रॉयल सीमा, तेलंगाना और तटीय आंध्र के बीच तीन हिस्सों में विभाजन, जिसमें हैदराबाद को रॉयलसीमा और तेलंगाना का अभिन्न हिस्सा बनाये रखने की सिफारिश है। उपरोक्त दोनों प्रस्ताव समिति खुद व्यावहारिक नहीं मान रही। उसकी राय में पहले प्रस्ताव की तो प्रासंगिकता ही समाप्त हो चुकी है तो दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं है। जहां तक तीसरे प्रस्ताव का सवाल है, वह तीनों क्षेत्रों की जनता को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं होगी। चौथा प्रस्ताव है राज्य का सीमांध्र और तेलंगाना में विभाजन और हैदराबाद को वृहत्तर हैदराबाद महानगर के तौर पर केंद्र शासित प्रदेश बनाने की। स्पष्ट है कि इस प्रस्ताव पर भी विभाजन के समर्थकों द्वारा आम सहमति बन पाएगी इसकी आशा न के बराबर है। पांचवा है, वर्तमान सीमाओं के भीतर राज्य का तेलंगाना और सीमांध्र के बीच विभाजन। इसके तहत हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी बनेगी और सीमांध्र के लिए नई राजधानी बनानी होगी। छठे सुझाव के तहत संवैधानिक उपायों से तेलंगाना क्षेत्र का सामाजिक-आर्थिक विकास किया जाने की बात है और इनका राजनीतिक सशक्तिकरण करके कानूनन तेलंगाना क्षेत्रीय परिषद का गठन करने की सिफारिश है। जहां तक समिति की राय है तो पांचवा और छठा प्रस्ताव इस समस्या के बेहतर विकल्प हो सकते हैं, लेकिन वह खुद छठे प्रस्ताव को सबसे उचित विकल्प के रूप में पेश करती है। तेलंगाना समर्थकों को तेलंगाना से कम कुछ भी मंजूर नहीं, जबकि समिति की राय है कि राज्य का बंटवारा न हो और तेलंगानावासियों का दिल जीतने के लिए प्रशासन और सरकारी नौकरियों में न केवल पर्याप्त पद दिए जाएं, बल्कि राज्य का मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी तेलंगाना क्षेत्र से ही बनाया जाए। समिति का मानना है कि तेलंगाना के गठन से नए राज्य में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति और बिगड़ेगी। हैदराबाद को तेलंगाना की राजधानी मानने के बाद भी इस राज्य में नक्सली समस्या से पार पाना टेढ़ी खीर होगी। आर्थिक विकास को लेकर इस नए राज्य की उम्मीदें इतनी बढ़ जाएंगी जिनका पूरा होना संभव नहीं होगा। नतीजन जिन उद्देश्यों के लिए राज्य का गठन होगा वे पूरे नहीं हो पाएंगे और उस स्थिति में राज्य की जनता का आक्रोश और विकराल रूप धारण कर लेगा। सच तो यह है कि आंध्र प्रदेश के विभाजन से न केवल राज्य के अंदर बल्कि बहार भी गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि इस मांग को मानने पर दूसरे राज्यों की मांग को बल मिलेगा। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इससे देश को न केवल आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा, बल्कि राजनीतिक समस्याएं भी बढ़ेंगी। यदि समिति की मानें तो राज्यों के पुनर्गठन के बाद ऐसा पहली बार होगा जब भाषाई आधार पर गठित प्रदेश के विभाजन की राजनीतिक मांग को केंद्र सरकार दो तेलगू भाषी राज्यों के निर्माण के साथ मानेगी। तेलंगाना के समर्थक हैदराबाद को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। असलियत यह है कि केंद्र सरकार कुछ भी कहे कि इन विकल्पों पर विचार किए जाने की जरूरत है। समिति समाधान की जगह सुझाव दे रही है जो अलग राज्य की मांग करने वालों को स्वीकार ही नहीं है। इसमें दो राय नहीं कि यह एक बहुत बड़ी समस्या है और इसको सावधानी पूर्वक हल करने की जरूरत है। जल्दबाजी से मामला और बिगड़ेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि आंध्र की राजधानी हैदराबाद में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत 41 है जो किसी कीमत पर विभाजन अथवा तेलंगाना में जाने की पक्षधर नहीं है। इन्हें नजरंदाज करना आसान नहीं होगा, बल्कि इससे मुश्किलें बढ़ेगी। नए राज्य में आरक्षण की समस्या से भी पार पाना मुश्किल होगा। राजनीतिक सत्ता का गणित गड़बड़ाएगा सो अलग, क्योंकि उस हालत में कुछ राजनीतिक दलों के नीचे से उनकी जमीन ही खिसक जाएगी और राज्य में उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। अब गेंद केंद्र के पाले में है देखना है कि वह इसे मानकर देश को छोटे-छोटे राज्यों में बांटना चाहती है या उसकी प्राथमिकता विकास है। असल में पिछले कुछ समय से तेलंगाना के गठन की मांग तेज हुई है। इन मांगों के पीछे कहीं पिछड़ेपन को तो कहीं क्षेत्र की उपेक्षा को जिम्मेदार कहा जा रहा है। परंतु असलियत में इसके पीछे राजनीतिक हित भी छिपे हैं, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता जो अशांति फैलाने व कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। कोई अपनी मांग के परिप्रेक्ष्य में राज्य पुनर्गठन आयोग के गठन की जरूरत बता रहा है तो कोई इसकी प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े कर रहा है तो कोई अलग राज्य के गठन को समस्या का समाधान मानने से ही इंकार कर रहा है। कुछ लोगों का मानना है कि समस्या का समाधान केवल अलग राज्य या स्वायत्त इकाई बना देने से तो होने वाला नहीं। वैसे इसमें दो राय भी नहीं कि भारत जैसे देश में जो सांस्कृतिक विविधता से परिपूर्ण है, क्षेत्रीय आकांक्षाओं को नकारा नहीं जा सकता। यह भी सच है कि अलग राज्य की मांग को हवा देने में एक-दूसरे से बंधे रहने की मजबूरी और अपनी-अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने की तड़प या यूं कहें कि छटपटाहट अहम भूमिका निभाती है। सामाजिक दृष्टि से भी इसकी महत्ता और जरूरत को झुठलाया नहीं जा सकता। आजादी के छह दशक बाद भी राष्ट्रीय अखंडता से क्षेत्रीय अस्मिता को जोड़कर देखने में न तो हम समर्थ हैं और न ही इतने परिपक्व। इस स्थिति में अलग राज्य के गठन के बाद अपनी समस्याओं-विषमताओं से कैसे पार पाएंगे यह समझ से परे है, क्योंकि केवल कुर्सी पा लेना ही तो काफी नहीं है। छोटे राज्यों के गठन के औचित्य का सबूत 10 साल पहले बनाए गए तीन नए राज्य- उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड हैं। इनके गठन के 10 साल बाद भी इनके हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है। बीते दिनों लोकमंच के अध्यक्ष अमर सिंह ने पूर्वाचल स्वाभिमान सद्भावना यात्रा की शुरुआत करते हुए इसके गठन के लिए क्षेत्र के पिछड़ेपन और सौतेले बर्ताव को मुख्य कारण बताया। संभवत: हर राज्य के गठन की मांग के पीछे यही अहम कारण बताए जाते हैं। छोटे राज्यों का गठन कहां तक उचित रहा है और वे कहां तक कामयाब रहे हैं, उत्तराखंड की दशा से इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। उत्तराखंड बनने के बाद यह आस बंधी थी कि अब तो राज्य की बागडोर पहाडि़यों के हाथों में होगी, वही पहाड़ की तकदीर लिखेंगे और उसका फैसला भी वही करेंगे, लेकिन आज ऐसा कुछ भी नहीं है। 10 साल बाद आज भी वहां के स्कूलों में शिक्षकों का अभाव है, अस्पतालों में डॉक्टर कम हैं या वह जाते ही नहीं। पहाड़ी जिले आज भी विकास से अछूते हैं और रोजगार के नाम पर नौजवान खुद को ठगा महसूस करते हैं। नेतृत्व राज्य के विकास का दावा करता नहीं थकता, जबकि हकीकत में अगर विकास का लाभ मिला है तो वह मात्र तीन शहरों, वह भी मैदानी जिलों रुद्रपुर, हरिद्वार और राजधानी देहरादून को। इसमें पहाड़ी जिलों को कुछ हासिल नहीं हुआ। खनिज, जल और वन-संपदा से भरा-पूरा यह राज्य आज भी धन कुबेरों की लूट का अड्डा बना हुआ है और दुख इस बात का है कि इस माामले में देश की संस्कृति धरोहर की रक्षा का दंभ भरने वाली भाजपा या कांग्रेस अथवा राज्य निर्माण का दावा करने वाला दल उक्त्रांद आदि ने धनकुबेरों की मदद करने में कीर्तिमान बनाया है। विडंबना यह है कि जिन उद्देश्यों के लिए इस राज्य का गठन किया गया वह आज भी अधूरे हैं। ऐसी स्थिति में यह कहना गलत न होगा कि यदि इसी के लिए अलग राज्य बनते रहे तो आम आदमी छला ही जाएगा। इस मामले में छत्तीसगढ़ और झारखंड की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। झारखंड के बारे में दावे कुछ भी किए जाएं, लेकिन सच यही है कि वहां भूख, गरीबी और बेकारी का साम्राज्य है। वहां की आर्थिक विकास दर लगातार पिछड़ रही है। राज्य बनने के साथ वहां दुनिया की बहुतेरी कंपनियां आई, लेकिन हुआ क्या? क्या वहां के नौजवानों को रोजगार मिले। राज्य के गठन के बाद से अब तक वहां मुख्यमंत्री ही बदलते रहे हैं और इसमें इस राज्य ने कीर्तिमान बनाया है। 5000 करोड़ से ज्यादा के घोटाले हुए है और नक्सली हिंसा से प्रभावित 24 से ज्यादा जिलों में तकरीब 1700 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। छत्तीसगढ़ माओवादी हिंसा से इस तरह त्रस्त है कि वहां का जन-जीवन अस्त-व्यस्त है। वहां कंपनियों में काम करने के लिए नवनियुक्त कर्मचारी मौत के भय से वहां जाना ही नहीं चाहते। वहां प्रशासनिक अव्यवस्था है, कानून-व्यवस्था लुंज-पुंज है और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। तीनों राज्यों से रोजगार की खातिर पलायन आज भी जारी है। यदि छोटे राज्यों के गठन के दस साल बाद भी यही हाल है तो उस हालत में और नए राज्यों के गठन से कुछ अधिक हासिल करने की उम्मीद गलत होग। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
इतालवी अतिथि की चिंता
लेखक क्वात्रोची के सन्दर्भ में आयकर न्यायाधिकरण के फैसले पर दिग्विजय सिंह के संदेहों को अनावश्यक मान रहे हैं....
बोफोर्स तोप सौदे में 73 लाख डालर की दलाली लेने वाले इतालवी व्यवसायी ओट्टावियो क्वात्रोची के प्रति कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की चिंता वाकई अद्भुत है। साफ तौर पर दिग्विजय सिंह का इस पर विश्वास है कि अतिथि देवो भव का विचार सभी अतिथियों पर लागू होना चाहिए-भले ही वे अपराधी हों या कमीशन एजेंट। दिग्विजय सिंह के मुताबिक आयकर विभाग के अपीलीय न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में बोफोर्स तोप सौदे में दलाली खाने वालों में क्वात्रोची का जो नाम लिया है वह तीन कारणों से संदेह पैदा करता है। पहला, इस निर्णय का समय बहुत बड़ी पहेली की तरह है। उनके मुताबिक न्यायाधिकरण को चार जनवरी को फैसला देना था, लेकिन उसने 31 दिसंबर को अपना निर्णय दे दिया। दूसरे, न्यायाधिकरण ने अपना फैसला तीन जनवरी को सार्वजनिक कर दिया अर्थात बोफोर्स मामला बंद करने संबंधी सीबीआइ की अपील पर अदालत का नजरिया सामने आने के ठीक एक दिन पहले। इस कथित जल्दबाजी से दिग्विजय सिंह को न्यायाधिकरण के मंतव्य पर संदेह होता है। दिगिवजय सिंह के संदेह का तीसरा आधार यह है कि न्यायाधिकरण विन चड्ढा के पुत्र हर्ष चड्ढा की अपील पर सुनवाई कर रहा था, लेकिन उसने क्वात्रोची को कमीशन का भुगतान किए जाने पर अपना ध्यान केंद्रित क्यों किया? दिग्विजय सिंह की इस साजिश संबंधी ध्योरी पर नजदीकी ध्यान दिए जाने की जरूरत है। सबसे पहले तो यह कि यदि संदेह के आधार सही भी हैं तो दिग्विजय सिंह सरीखे एक भारतीय नागरिक को इस बात से क्यों परेशानी हो रही है कि आयकर न्यायाधिकरण ने कमीशन एजेंटों (जिनमें एक विदेशी भी शामिल है) के संदर्भ में अपना फैसला तीन-चार दिन पहले सुना दिया। आखिर दिग्विजय किस जल्दबाजी की बात कर रहे हैं? क्या उन्हें नहीं मालूम कि न्यायाधिकरण का फैसला बोफोर्स द्वारा क्वात्रोची के खाते में दलाली की रकम जमा कराए जाने के 22 वर्ष बाद आया है? दूसरे, दिग्विजय सिंह को यह शिकायत क्यों है कि न्यायाधिकरण का फैसला तीन जनवरी को सार्वजनिक कर दिया गया? इसके विपरीत एक सजग नागरिक के रूप में उन्हें यह सवाल उठाना चाहिए था कि 31 दिसंबर को फैसला हो जाने के बावजूद इसे तीन जनवरी को क्यों सार्वजनिक किया गया? जिन्हें भारतीय संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही की परवाह है उन्हें इस देरी पर चिंतित होना चाहिए, न कि यह सवाल उठाना चाहिए कि फैसला एक ऐसे समय क्यों दिया गया जब क्वात्रोची के संदर्भ में महत्वपूर्ण अदालती निर्णय आना था। कांग्रेस पार्टी में जिम्मेदारी वाला पद संभालने वाले दिग्विजय सिंह की इस शिकायत का भी कोई औचित्य नहीं कि न्यायाधिकरण ने क्वात्रोची का उल्लेख क्यों किया? आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण का फैसला पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति इससे सहमत होगा कि दिग्विजय के संदेह का कोई आधार नहीं है। न्यायाधिकरण ने कहा है कि कमीशन एजेंटों पर प्रतिबंध के बावजूद बोफोर्स ने क्वात्रोची के कहने पर 15 नवंबर 1985 को एई सर्विसेज के साथ नया करार किया। इस समझौते के अनुसार यदि बोफोर्स को 31 मार्च 1986 के पहले सौदा मिल जाता तो वह सौदे की कुल राशि की तीन प्रतिशत राशि दलाली के रूप में भुगतान करेगी। यह विचित्र संयोग है कि बोफोर्स और भारत के समझौते पर 24 मार्च 1986 को हस्ताक्षर हुए। बोफोर्स ने भारत के रक्षा मंत्रालय को 10 मार्च, 1986 को भेजे गए पत्र में जानबूझकर दलाली से संबंधित समझौते का तथ्य छिपाया। न्यायाधिकरण ने उल्लेख किया है कि क्वात्रोची 28-2-1965 से 29-7-1993 तक भारत में रहे। इस दौरान केवल 4-3-1966 से 12-6-1968 की संक्षिप्त अवधि के दौरान वह देश से बाहर रहे। न तो क्वात्रोची और न ही स्नैमप्रोगेटी को हथियार अथवा किसी अन्य रक्षा उपकरण का कोई अनुभव था। भारतीय अधिकारियों द्वारा स्विट्जरलैंड से प्राप्त किए गए बैंक प्रपत्रों के आधार पर न्यायाधिकरण ने बताया है कि भारत ने सौदे की 20 प्रतिशत राशि का भुगतान 2 मई 1986 को किया। इसमें से बोफोर्स ने तीन सितंबर 1986 को ज्यूरिख स्थित एई सर्विसेज के अमुक खाते में 7343941.98 डालर की रकम में जमा कर दी। साफ है कि कांग्रेस में वफादारी की एकमात्र कसौटी यह है कि आलाकमान के इतालवी मित्रों के हितों की आप कितनी चिंता करते हैं। कांग्रेस के नेताओं के लिए इटली का कोई भी अतिथि देवता के समान ही है। यह दिग्विजय सिंह सरीखे नागरिक ही हैं जो भारत को एक शताब्दी से भी अधिक समय से गुलाम बनाए हुए हैं। उन्होंने इसकी झलक दिखा दी है कि यदि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन जाती हैं तो कांग्रेस नेता चाटुकारिता की किस हद तक गिर सकते हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Subscribe to:
Posts (Atom)