Showing posts with label पृ.सं.३. Show all posts
Showing posts with label पृ.सं.३. Show all posts

Saturday, March 26, 2011

जैतापुर में जारी है जमीन दखल की राजनीति


न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) और फ्रांस की कम्पनी अरेवा के बीच हुए समझौते से दोनों देशों की दोस्ती को मजबूत आधार भले मिला पर उसकी कीमत भारत के नागरिक और भारतीय अर्थव्यवस्था जैतापुर में चुकाने के लिए मजबूर की जा रही है। हम यहां यदि प्रकल्प पर होने वाले खर्च के मुद्दे पर चुप भी हो जाएं, जो कि एक बेहद विवादास्पद मुद्दा है, उसके बाहर यदि सुरक्षा की बात करें तो उसे लेकर भी पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है।
विरोधियों को सत्ता का ऐसा सबक
जनहित सेवा समिति के संयोजक प्रवीण गवाणकर से पिछले महीने ही उनके घर पर माड़वन में मुलाकात हुई थी। उसी वक्त उन्हें आशंका थी कि पुलिस उन्हें ले जाएगी। वजह साफ है, वे दो लाख करोड़ रुपये के जैतापुर परमाणु ऊर्जा प्रकल्प का विरोध जो कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले जब पावस (जैतापुर) के एक मराठी पत्रकार प्रशांत हरचेकर से फोन पर बात हो रही थी; उसी ने बताया कि प्रवीण को पुलिस ने सात दिनों की न्यायिक हिरासत में ले लिया है। हरचेकर ने ही बताया कि प्रवीण पर धारा 317, 395, 353, 341, 427, 143, 03 और 07 लगाई गई है। जैतापुर में प्रस्तावित 9,900 मेगावाट परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए कुल 9,38 हेक्टेयर जमीन ली जानी है, जिसमें 6,69 हेक्टेयर जमीन माड़वन की है। प्रवीण की गिरफ्तारी के ठीक बाद माड़वन में महाराष्ट्र के एक बड़े नेता अपने समर्थकों के साथ एक बड़ा 'रेला'
करने वाले हैं। उम्मीद है, यह लेख छपने तक यह खबर आ चुकी होगी कि माड़वन के लोग परियोजना के साथ हैं जबकि रेला में शामिल लोगों का काफिला रत्नागिरि, चिपलून और आसपास के क्षेत्रों से इकट्ठा किए जाने की योजना है। खुद को जैतापुर वाला बताकर कुछ लोग मीडिया में आकर गलतबयानी भी कर रहे हैं। इसी क्रम में मछुआरों की एक बस्ती साखरी नाटे में किसी जयेंद्र पुरुलेकर का पुतला जलाया गया।
गलतबयानी कर रही सरकार
मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण कहते हैं कि स्थानीय लोग राजी हैं, जमीन देने के लिए। और जब वे खुद मुम्बई में इस मुद्दे पर बातचीत के लिए माड़वन के लोगों को बुलाते हैं तो गांव वाले जाने से साफ इनकार कर देते हैं। अब इसका क्या अर्थ निकाला जाए? गांव वालों का पक्ष साफ है-'बातचीत उस समय की जाए जब हमें (स्थानीय लोगों को) भी अपनी बात कहने का मौका मिले और उम्मीद हो कि हमने अपनी बात से मुख्यमंत्रीजी को विश्वास में ले लिया तो परियोजना रुक जाएगी। ऐसी जगह बात करने का क्या फायदा जिसमें माड़वन में प्रकल्प लगाने का फैसला पहले से सुरक्षित है।'
संदेहास्पद है माहौल
माड़वन में जाने पर जगह-जगह परियोजना के विरोध में लिखे हुए नारे मिले। पूरे गांव में दहशत का माहौल है। नए चेहरे पर स्थानीय लोग बिल्कुल विश्वास नहीं कर पा रहे! न जाने किस वेश में आ जाएं 'सरकार'। परियोजना की जगह पर भारी संख्या में पुलिस वालों को बिठा दिया गया है। सरकार की तरफ से हर तरह का दबाव गांव वालों पर बनाने की कोशिश जारी है। लेकिन स्थानीय लोग किसी भी कीमत पर अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हैं। परिणाम यह है कि गांव वालों को पुलिसिया जुर्म का शिकार होना पड़ रहा है। इस समय लगभग दो सौ लोगों पर विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा है। लगभग एक दर्जन पंचायतें भंग हो चुकी हैं।
जमीन पर दिखा जंगलराज
कई लोगों को तड़ीपार भी होना पड़ा। स्थानीय लोगों ने ही बताया कि परियोजना का विरोध कर रहे इरफान काजी नाम के एक युवक की मौत पुलिस की गाड़ी के नीचे आने से हो गई। ऐसे बच्चे को भी पुलिस गांव से उठाकर थाने ले गई, जो स्कूल से लौटे थे। माड़वन में रहने वाले एक सज्जन ने कहा-'हम लोग जंगलराज-जंगलराज किताबों में पढ़ते थे। इस बार हम अपनी आंखों से वह देख रहे हैं।' यहां बताते चलें कि माड़वन को रत्नागिरि जिले में स्वतंत्रता सेनानियों के गांव के रूप में जाना जाता है। इस गांव में आधा दर्जन से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार रहते हैं। अंग्रेजों से लड़ने वालों के परिवारों को अब अपनी सरकार से लड़ना पड़ रहा है। वैसे उनके लिए अपनी सरकार अंग्रेज से भी अधिक क्रूर साबित हो रही है, चूंकि अंग्रेजों ने इन्हें अपने घर से तो बेदखल नहीं किया था।
अभी से दिखने लगे दुष्प्रभाव
प्रवीण गवाणकर से जनवरी में जब मुलाकात हुई थी तो उनके शब्द थे, 'हम जीते जी तो यह जमीन नहीं दे सकते, सरकार चाहे तो हमारी हत्या करके यह जमीन ले ले।' तारापुर परियोजना जो माड़वन में प्रस्तावित परियोजना से बहुत छोटी है, उसका जिक्र करते हुए गवाणकर ने बताया 'हमें सरकार की तरफ से बताया जा रहा था कि तारापुर में सब अच्छा चल रहा है। मैं खुद उस गांव में गया। वहां की स्थिति बिल्कुल दयनीय है। वहां सिर दर्द, घुटनों में दर्द और गर्भपात की संख्या में आश्र्चयजनक वृद्धि हुई है। गांव में कमजोर बच्चे पैदा हो रहे हैं। परियोजना से पहले इस गांव में मछली पकड़ने के लिए 48 लंच थे, अब सिर्फ दो ही रह गए हैं। मैं स्पष्ट शब्दों में कह देना चाहता हूं, हम गांव वाले जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र परियोजना के बिल्कुल खिलाफ हैं।'


Friday, February 4, 2011

सरकार की सीरत पर हर रोज उठ रहे सवालिया निशान


सीवीसी पीजे थामस के चयन की फाइलें सरकार की सीरत पर हर रोज नए सवालिया निशान लगा रही हैं। मामले में उजागर हुए ताजा तथ्य बताते हैं कि पीएम की अगुवाई वाली चयन समिति में न केवल नेता विपक्ष की राय को दरकिनार किया गया, बल्कि सरकार ने उनके तर्को को रिकार्ड का हिस्सा बनाना भी मुनासिब नहीं समझा। सीवीसी की नियुक्ति से जुड़ी सरकारी फाइलें कास्मेटिक सर्जरी का नमूना पेश करती हैं जिसमें थामस के अतीत के दागों की कोई झलक ही नहीं दिखती है। वहीं नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी यहां तक बताते हैं कि सीवीसी चुनने के लिए हुई अहम बैठक से पहले ही सरकार ने विपक्ष की राय को दरकिनार कर बहुमत से फैसले का विकल्प भी खंगाला था। दैनिक जागरण के पास मौजूद दस्तावेज के मुताबिक सीवीसी की नियुक्ति को लेकर 3 सितंबर 2010 को प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की अहम बैठक के ब्योरे को महज दो वाक्यों में समेट फाइल बंद कर दी गई। दस्तावेज में फैसले को लेकर सुषमा स्वराज को असहमत तो दिखाया गया है, लेकिन थामस के दागी रिकार्ड को लेकर बैठक में हुई पूरी बहस और उनके तर्को को सिरे से गायब कर दिया गया है। लिहाजा नियुक्ति की फाइल थामस के आरोपपत्र ही नहीं, बल्कि इस मामले पर विवाद को लेकर भी पूरी तरह मौन हैं। इस बारे में पूछे जाने पर चिदंबरम कहते हैं, ऐसी बैठकों के सिर्फ फैसले दर्ज किए जाते हैं, उसके ब्योरे नहीं। वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि इस फैसले से पहले इस मामले पर मंत्रालय के आला अधिकारियों ने यही सलाह दी थी कि इसे बहुमत की बजाए आम सहमति का चेहरा देना ही मुनासिब होगा।


Sunday, January 23, 2011

किसी को नहीं हटाया, सिर्फ फेरबदल


देर से किया और वह भी दुरुस्त नहीं.! लंबी मगजमारी और बेशुमार इंतजार के बाद हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद केंद्र सरकार और कांग्रेस भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता जैसे गंभीर मुद्दों के खिलाफ कार्रवाई का संदेश देने में बिल्कुल नाकाम दिखीं। भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए सरकार ने मंत्रालयों में फेरबदल की कॉस्मेटिक सर्जरी भर की। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इसे छोटा फेरबदल करार दिया और व्यापक फेरबदल बजट सत्र के बाद करने का एलान किया। मौजूदा फेरबदल में छोटे-बड़े बदलावों के नाम पर 35 मंत्रालयों या विभागों को इधर से उधर किया गया है। किसी भी मंत्री को हटाया नहीं गया है। इस विस्तार में किए गए एलानों को पूरा करने में प्रधानमंत्री इस कैबिनेट विस्तार में मजबूर नजर आए। पहले तो बार-बार विस्तार का समय बढ़ा। इसके अलावा उन्होंने कैबिनेट को अपेक्षाकृत युवा करने का संकेत दिया था और भ्रष्टाचार व अकर्मण्यता के खिलाफ कार्रवाई का दम भी भरा था। दोनों ही मोर्चो पर आरोपों से घिरे किसी भी मंत्री को सरकार से बाहर करने का साहस नहीं दिखा सकी। कैबिनेट फेरबदल को अगर भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के पैमाने को मापें तो निराशा ही हाथ लगती है। राष्ट्रमंडल खेल आयोजन से जुड़े रहे एमएस. गिल को खेल मंत्रालय से हटाकर सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय में पटक दिया गया। उनकी जगह गृह राज्यमंत्री रहे अजय माकन को खेल एवं युवा मंत्रालय देकर मंत्रालय को नया और जवान चेहरा देने की कोशिश की गई है। इस कदम से अगर सरकार ने थोड़ा-बहुत संदेश दिया भी तो दूसरे फैसलों में भ्रष्टाचार और शिथिलता के आरोपी मंत्रियों को एक-दूसरे से बदल भर दिया। राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान निर्माण संबंधी विवादों में रहे शहरी विकास मंत्रालय की कमान संभालने वाले जयपाल रेड्डी को प्रोन्नत कर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस जैसा हाईप्रोफाइल मंत्रालय दे दिया गया। यही नहीं, राजमार्ग परियोजनाओं में शिथिलता के लिए जिम्मेदार सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री कमलनाथ को जयपाल रेड्डी की जगह भेजा गया है। खास बात है कि सरकार की झुग्गीमुक्त शहरों की अहम परियोजना में शहरी विकास मंत्रालय की खास भूमिका होगी। उस पर भी तुर्रा यह है कि तेल एवं प्राकृतिक गैस से शिथिलता के चलते हटाए गए मुरली देवड़ा को कंपनी मामलों का मंत्री बना दिया गया है। सबसे दिलचस्प बदलाव ग्रामीण विकास व पंचायती राज्य मंत्रालय में हुआ है। शिथिलता के आरोपों से जूझते रहे सीपी. जोशी को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का हस्तक्षेप बचा ले गया। उन्हें इस मंत्रालय से हटाकर कमलनाथ की जगह सड़क परिवहन एवं राजमार्ग जैसे अहम मंत्रालय में भेजा गया है। आदर्श सोसाइटी से लेकर सूदखोरों को बचाने जैसे मामलों और भारी उद्योग मंत्रालय में ध्यान न देने के आरोपों में घिरे रहे विलास राव देशमुख को सीपी. जोशी की जगह ग्रामीण विकास मंत्रालय जैसा बेहद जिम्मेदारी वाला मंत्रालय दिया गया है। इस्पात मंत्रालय में शिथिलता के लिए जाने जाते रहे वीरभद्र सिंह को अति सूक्ष्म, छोटी और मझोले उद्यमों के मंत्रालय भेजा गया है। मगर उनकी जगह उम्रदराज बेनी प्रसाद वर्मा को राज्यमंत्री का स्वतंत्र प्रभार देकर कैसी गतिशीलता देने की कोशिश की गई है, समझ से परे है। बडे़ बदलाव के नाम पर श्रीप्रकाश जायसवाल, सलमान खुर्शीद और प्रफुल्ल पटेल को कैबिनेट का दर्जा देने का फैसला रहा। इसके अलावा बेनी प्रसाद वर्मा, अश्विनी कुमार और केसी. वेणुगोपाल को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। जायसवाल का कोयला मंत्रालय बरकरार रखकर उनका रुतबा और हनक बढ़ा दी गई है। सलमान खुर्शीद को कैबिनेट का दर्जा तो मिला, लेकिन उनसे कंपनी मामलों का मंत्रालय छीन लिया गया। खुर्शीद इस मंत्रालय में बेहद सक्रिय थे और कई औद्योगिक घराने उनके पीछे पड़े हुए थे। उनका अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय बरकरार रखते हुए जल संसाधन मंत्रालय और दिया गया है। इसी तरह प्रफुल्ल पटेल को कैबिनेट मंत्री तो बनाया गया, लेकिन उन्हें नागरिक उड्डयन की जगह भारी उद्योग जैसा कम सक्रिय मंत्रालय दिया गया है। प्रफुल्ल को कैबिनेट दिलाने के लिए कृषि मंत्री शरद पवार ने उपभोक्ता मामले व सार्वजनिक वितरण मंत्रालयों को छोड़ दिया। अब यह मंत्रालय पवार के राज्य मंत्री रहे केवी. थॉमस को स्वतंत्र प्रभार का दर्जा देकर दिया गया है।


Wednesday, January 19, 2011

उत्साहित भाजपा की नजर 300 सीटों पर

बिहार के चुनाव परिणामों ने उत्तर प्रदेश में सबसे कमजोर स्थिति से जूझ रही भाजपा में नई जान फूंक दी है। बिहार चुनाव के बाद हुए पार्टी के अंदरूनी सर्वे में पार्टी के वोट बैंक में साढ़े चार फीसदी का इजाफा हुआ है और वह बीते लोकसभा चुनाव की तुलना में कांग्रेस से आगे आ गई है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो कांग्रेस नेतृत्व पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि कि बिहार के परिणामों ने बता दिया है कि राहुल का कितना असर है? पार्टी उत्तर प्रदेश में कभी न कभी जीती गई लगभग 300 सीटों पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी और राज्य में अपनी सरकार बनाने के लक्ष्य को लेकर चुनाव मैदान में उतरेगी। गडकरी ने उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी फैक्टर के बारे में कहा कि अब तो राहुल गांधी के दौरे भी वहां पर मुश्किल हो गए हैं? बिहार के चुनाव ने सिद्ध कर दिया है कि वह क्या है? जहां-जहां वह और सोनिया गांधी चुनाव प्रचार करने गए, वहां पर पार्टी चुनाव हारी है। पहले नौ सीटें थी, अब चार रह गई हैं। राहुल को उत्तर प्रदेश में भी प्रदर्शनों का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि बिहार चुनाव से पहले राज्य में मायावती व मुलायम के विकल्प के बारे में कांग्रेस उभर रही थी, लेकिन अब भाजपा ने उसे पीछे छोड़ दिया है। वहां की जनता मायावती सरकार से नाराज है और मुलायम को वह चाहती नहीं है। भाजपा उत्तर प्रदेश में भी बिहार फार्मूले पर अमल करनी जा रही है। अंतर केवल इतना है कि वहां पर गठबंधन में चुनाव मैदान में थी और उत्तर प्रदेश में अकेले। उत्तर प्रदेश के लिए अपनी भावी तैयारी के बारे में गडकरी ने जागरण से चर्चा करते हुए दो टूक कहा कि कहा, हमारे घर में भी उत्तर प्रदेश में लेकर कोई झगड़ा नहीं है। अब पूरी ताकत यूपी पर है। बिहार चुनाव के पहले सर्वे किए थे तब चौथे नंबर पर थे। पर अब हमारा 4.5 फीसदी वोट बढ़ा है और कांग्रेस चौथे नंबर पर गई है। आने वाले दिनों में हम मायावती सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज करेंगे। लोग मायावती व मुलायम को छोड़कर तीसरे विकल्प की तलाश में है। कांग्रेस पार्टी से लोग महंगाई भ्रष्टाचार को लेकर नाराज है।

Sunday, January 9, 2011

सिब्बल के बयान के बाद और जरुरी हुई जेपीसी

भ्रष्टाचार के मुद्दों पर केंद्र की संप्रग सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाली भाजपा के तेवर दूर संचार मंत्री कपिल सिब्बल के नए तर्को के बाद और तीखे हो गए हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि ए. राजा और सरकार को पाक-साफ करार देकर कांग्रेस नेता बोफोर्स की गलती दोहराने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सीएजी के खुलासे और सिब्बल के आंकड़े के बाद तो जेपीसी जांच और जरूरी हो जाती है। इस बीच आतंकवाद को लेकर असीमानंद के खुलासे से भाजपा थोड़ी असहज है। नए साल में सरकार पर चौतरफा उठ रहे सवालों से उत्साहित भाजपा के नेता रणनीति बनाने गुवाहाटी में जुटे हैं। आतंकवाद के मामले पर असीमानंद के खुलासे से उन्हें थोड़ा झटका जरूर लगा है पर वह इसके कारण भ्रष्टाचार के मुद्दे की धार को कमजोर नहीं होने देना चाहते। सरकार की तरफ सिब्बल ने मोर्चा संभाला तो उनका जवाब जेटली ने दिया। उन्होंने दो टूक कहा कि उन्हें पहले ही आशंका थी कि संप्रग सरकार सच्चाई सामने लाने की बजाय पूरे मामले को रफा-दफा करने की कोशिश करेगी। बोफोर्स मामले में 23 साल उसने यही किया। सिब्बल ने विकृत आंकड़े पेश कर यह साबित करने की कोशिश की है कि ए. राजा ने नुकसान नहीं, बल्कि लाभ कराया है। यह आंखों में धूल झोंकने जैसा है। जेटली ने कहा कि अगर ऐसा था तो इस्तीफा क्यूं लिया? सीबीआई और पीएसी की जांच का क्या मतलब है? जेटली ने कहा कि 2007 में जब दूर संचार नियामक (ट्राई) ने बाजार दर पर आवंटन देना तय किया था तो 2008 में वर्ष 2001 की दर पर आवंटन कैसे किया गया। वर्ष 2008 में यह दर 9500 करोड़ रुपये थी, जबकि आवंटन 1651 करोड़ रुपये पर किया गया। सीएजी ने चार अलग- अलग तरीके से नुकसान का आकलन किया है। उसने 3जी के भी इसी आधार पर आवंटन किए जाने पर 1.76 लाख करोड़ रुपये के नुकसान की बात कही है। उन्होंने सिब्बल के तर्को पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि उन्होंने सीबीआई, पीएसी और जेपीसी का दायित्व निभाते हुए जिस तरह खुद ही सरकार को पाक-साफ करार दे दिया वह हास्यास्पद है। इसके पहले असीमानंद के आतंकवादी घटना में शामिल होने की स्वीकारोक्ति व संघ के नेताओं पर उंगली उठाने के खुलासे पर टिप्पणी करते हुए भाजपा ने इसे मोड़ दे दिया। पार्टी ने कहा कि आतंकवाद को भगवा रंग देने की साजिश हो रही है। मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जांच होनी चाहिए, लेकिन यह ध्यान रखा जाए कि वह पूर्वाग्रह से ग्रसित न हो। उन्होंने कहा कि जो दोषी है उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने इस तरह की खबरों को लीक किए जाने पर भी चिंता जताई।

Saturday, January 8, 2011

उम्मीदों की पासबुक : सारा चुनाव खर्च होगा एक जगह दर्ज

यह उम्मीदों की पासबुक है। वह पासबुक जो देश और समाज की जड़ों में घुस चुकी राजनीति को आने वाले समय में खोखला होने से बचा सकती है। बिहार चुनावों में इसका शुरुआती परीक्षण हो चुका है। अब बारी है व्यापक और गहन परीक्षण की। नए साल में यह परीक्षण होगा। बिहार चुनाव में पहली बार चुनाव आयोग ने चुनावी खर्च के लिए एक अलग पासबुक का प्रावधान किया था। यानी उम्मीदवारों को अपना हर चुनावी खर्च एक पासबुक के जरिए करना था। जाहिर तौर पर वोटों की खरीद-फरोख्त और तय सीमा से कहीं आगे बढ़कर खर्च करने वालों के लिए यह प्रावधान एक झटके जैसा है। आयोग की नई पहल के अनुसार हर उम्मीदवार को नामांकन भरने से पहले किसी भी बैंक में एक खाता खुलवाकर इसकी लिखित जानकारी देनी होती है। यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि संयुक्त रूप से यह खाता अपने चुनावी एजेंट के अलावा किसी के साथ नहीं खोला जा सकता। इस छोटी सी पहल के जरिए आयोग ने एक साथ कई मोर्चे दुरुस्त कर दिए हैं, जिसका प्रभाव आने वाले चुनावों में दिखेगा। मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी पहले ही संकेत दे चुके हैं कि बिहार के परीक्षण से वह उत्साहित हैं और आगे की राह तय है। अब उनके लिए मुश्किल हो सकती है जो चुनावी खर्च की हर सीमा को तोड़ने में लगे हैं। दरअसल, यह पासबुक उम्मीदवारों के जरिए उनसे संबंधित लोगों और पार्टियों पर भी नजर रखेगी। मसलन, पासबुक में कोई आमद दिखाई जाती है, तो स्रोत छिपाना मुश्किल होगा। अगर किसी व्यक्ति ने चंदा दिया है, तो आयोग से लेकर आयकर विभाग तक वह व्यक्ति भी नजरों में होगा। राजनीतिक दल से सहायता मिली है, तो उसका बहीखाता भी सामने होगा। आयोग उस आधार पर पार्टी के खर्चो का आकलन कर सकता है। हालांकि राजनीतिक अखाड़े के पहलवान छिपे तौर पर भी खर्च करते हैं, लेकिन पूरी संभावना है कि गहमागहमी के बीच वह कोई सुराग दें। उस सुराग से तह तक पहुंचने के लिए आयोग ने एक्सपेंडीचर आब्जर्वर भी तैनात करने शुरू कर दिए हैं, जिन पर उम्मीदवारों के बही खातों को खंगालने की जिम्मेदारी होती है। कोई बेमेल विवरण उम्मीदवारों के लिए मुसीबतों का पहाड़ बन सकता है।