Showing posts with label पृ.सं.१०. Show all posts
Showing posts with label पृ.सं.१०. Show all posts

Monday, March 7, 2011

नई इबारत लिखने की तैयारी


पाच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव इस दफा तय कर देंगे कि देश की राजनीति का आकार- प्रकार कैसा होगा। इन राज्यों में कांग्रेस और उसके घटक दलों की प्रतिष्ठा दांव पर है। सीटों के तालमेल के अलावा भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों पर उन्हें जनता से दो-चार होना है। ऐसे में यह चुनाव कांग्रेस और उसके घटक दलों के लिए अग्नि परीक्षा हैं तो वामपंथियों के सामने अपने दो राज्यों के किलों को बचाये रखने की अहम चुनौती। इन राज्यों में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का कुछ खास नहीं है जबकि वामपंथियों का राजनीतिक अस्तित्व दांव पर है। पश्चिम बंगाल और केरल में उनकी सरकार है और अभी जो राजनीतिक स्थितियां हैं, उनमें उनके इन किलों की चूलें हिलती नजर आ रही हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस के साथ पश्चिम बंगाल और केरल वामपंथियों से छीनकर उन्हें उनकी राजनीतिक औकात बताने की जुगत में है। उसकी कोशिश उसे इन राज्यों में हाशिये पर लाने की है। इसके अलावा उसकी कोशिश असम और पांडिचेरी में अपनी सरकार को येनकेन प्रकारेण सत्ता में बनाये रखने की है। तमिलनाडु में वह द्रमुक के सहारे अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश में है। क्या यह इतना आसान है, जितना कांग्रेस के रणनीतिकार सोच रहे हैं? उसे अपने सत्ता वाले राज्यों में भितरघात से जूझना पड़ेगा तो केरल में उसे अपने ही एक सहयोगी घटक राकांपा से भिड़ना होगा। शरद पवार पहले ही यहां धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ मोर्चा बनाने की घोषणा कर चुके हैं तो पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में सहयोगी दलों के साथ वह जनता की कसौटी पर हैं। इन राज्यों में वह अपने मजबूत सहयोगी दलों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने के सपने देख रहे हैं। ऐसी जटिल व्यूह रचना के बीच इन राज्यों के राजनीतिक हालात और चुनौतियों को समझना जरूरी हो गया है। राजनीतिक पंडितों की नजरें दो बड़े राज्यों- पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु पर टिकी हैं। यहां आने वाले दिनों में बनने-बिगड़ने वाले समीकरण ही राजनीति की नई पटकथा लिखेंगे। बंगाल में तीन दशक से भी अधिक समय से कम्युनिस्टों का राज है, जिसे तृणमूल कांग्रेस कड़ी चुनौती दे रही है। एक लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण उसका विरोध हो रहा है क्योंकि औद्योगिक विकास तेजी से न होने के कारण राज्य की हालत काफी खस्ता हुई है। रोजगार के अवसर कम होने के कारण जहां युवक उससे कट गये हैं, वहीं मोटिया मजदूर भी उसके हाथ से फिसल गया है। ऐसा नहीं कि बुद्धदेव भट्टाचार्य की नजर इस ओर नहीं गई। उन्होंने औद्योगीकरण की दिशा में कदम बढ़ाया भी, पर उनके इस विचार को पार्टी का भरपूर समर्थन नहीं मिला। उन्होंने 2007 में पूर्वी मिदनापुर के नंदीग्राम में रसायन केंद्र बनाने की घोषणा की थी। विशेष आर्थिक नीति के तहत बनाये जाने वाले इस केंद्र की बात ग्रामीणों को रास नहीं आई और उन्होंने विरोध शुरू कर दिया, जिसमें 14 प्रदर्शनकारी पुलिस के हाथों मारे गये। परिणामस्वरूप उन्हें तत्कालीन राज्यपाल से लेकर अपनी पार्टी के बड़े नेताओं की आलोचना झेलनी पड़ी। घनी आबादी वाले इस राज्य में भूमि अधिग्रहण की समस्या को वह ठीक से समझ नहीं पाये। इसके विपरीत प्रदेश में निवेश के लिए उन्होंने उद्योगपतियों से अपनी निकटता बढ़ाई। इससे लोगों में संकेत गया कि वे कारखानेदारों और व्यापारियों के पक्ष में मजदूरों को धोखा दे रहे हैं। विरोध के ऐसे माहौल में उद्योगपतियों ने भी उनसे किनारा कर लिया। इसीलिए 28 माह बाद टाटा ने 2008 में अपनी परियोजना सिंगूर से हटा ली। ऐसे में ग्रामीण जनता भी सरकार से कट गई है। इन विपरीत परिस्थितियों में वामपंथी अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने की रणनीति बना रहे हैं। केरल में पार्टी स्वयं अपनों से ही लड़ रही है। मुख्यमंत्री अच्युतानंदन के खिलाफ ही पार्टी का एक बड़ा धड़ा लगा हुआ है। किंतु राज्य में जो हालात हैं, उसमें पार्टी के पास उनसे ईमानदार छवि वाला ऐसा कद्दावर नेता नहीं दिखता जो संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे का मुकाबला कर सके। इसलिए, लाख मतभेद के बावजूद पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व उनके ही सहारे यहां राजनीतिक भाग्य अजमाना चाह रहा है। वैसे राकपा यहां कांग्रेस के खिलाफ आंखें तरेर रही है पर कांग्रेस के रणनीतिकार इसे आया- गया मान कर चल रहे हैं। उनका मत है कि वामपंथियों में जिस तरह की मारकाट है, वह उससे सत्ता छीन ही लेंगे। उनकी यह सोच कितनी कारगर होगी, यह तो आने वाले समय ही बतायेगा पर अभी इन दोनों राज्यों का जो राजनीतिक परिदृश्य है, उसमें वामपंथ का दुर्ग पूरी तरह हिलता नजर आ रहा है। तृणमूल कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ जैसा है। वह वामपंथियों से सरकार छीनने के लिए कोई कोर-कसर छोड़ना नहीं चाहती। यहां कांग्रेस को सीटों के तालमेल पर काफी मोलतोल करना है। वैसे ममता बनर्जी ने अपने तेवर दिखा दिये हैं। वह कांग्रेस को 65 से अधिक सीटें देने को तैयार नहीं जबकि कांग्रेस 100 सीटें चाहती है। ऐसे में तकरार स्वाभाविक है। इन स्थितियों में भितरघात और वोटों के एक-दूसरे के पक्ष में विभाजन की समस्या से इनकार नहीं किया जा सकता। निकाय चुनावों में ममता बनर्जी इस तरह की शिकायत कर चुकी हैं। इसके विपरीत भाजपा ने भी, जिसकी यहां वोटकटवा की भूमिका होगी, सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने की घोषणा की है। ग्रामीण क्षेत्रों में वह कम्युनिस्ट पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है तो शहरी और कस्बों में कांग्रेस-तृणमूल गठबंधन के लिए भी खतरा हो सकती है। वामपंथी इन संभावनाओं के बीच अपनी सफलता की राह तलाश रहे हैं किंतु अभी राज्य का जो परिदृश्य है, उसमें परिवर्तन की आहट सुनाई दे रही है। यह संभव तभी होगा, जब तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस गठबंधन धर्म ईमानदारी से पालन करेंगे। तमिलनाडु में द्रमुक नेता करुणानिधि के लिए अपनी सरकार को बचा पाना आसान नहीं दिखता। भ्रष्टाचार के आरोप से उनकी सरकार सनी है, जिसकी आंच उनके परिवार तक पहुंच चुकी है। उनकी पार्टी का दलित चेहरा ए.राजा दूर संचार घोटाले में सलाखों के पीछे है, जिसे जयललिता चुनावी मुद्दा बना रही हैं। इतना ही नहीं, पार्टी पर आधिपत्य को लेकर उनके परिवार में भी घमासान है। ऐसी स्थिति में करुणानिधि भारी संकट में हैं और कांग्रेस इसी कमजोरी का लाभ सीटों के बंटवारे में उठाना चाहती है। वह 70 से 75 सीट चाहती है, जबकि द्रमुक उसे 53 सीट तक देने को तैयार दिखती है। यहां कांग्रेस का बड़ा वर्ग अकेले अपने बलबूते पर चुनाव लड़ने की पहले से ही वकालत कर रहा है। ऐसे में सामंजस्य बनाना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इसके विपरीत केरल और असम में कांग्रेस को सीटों के जोड़-तोड़ पर ज्यादा मशक्कत नहीं करनी है। असम में पार्टी की नजर छोटे-मोटे दलों के सहयोग पर केंद्रित है। केरल में पार्टी को अपनों को ही एकजुट बनाये रखने के लिए कोशिश करनी पड़ रही है। सूबों में पार्टी कुनबों में बंटी नजर आ रही है। यही बिखराव ही कम्युनिस्टों के लिए फिलहाल राहत देने वाला है। इसके विपरीत असम में असम गण परिषद से अलग हुए धड़े इस बार एकजुट होकर लड़ रहे हैं तो मुस्लिम वोट के लिए परिषद ने भाजपा से दूरी बना ली है क्योंकि यहां के नौ जिलों की 23 से 25 सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कांग्रेस सहित अन्य क्षेत्रीय दल इन्हें पटाने में लगे हैं। किंतु मुसलमानों के कल्याण को लेकर शुरू योजनाओं में भ्रष्टाचार के चलते मुसलमान नाराज बताये जाते हैं। इसके अलावा कई क्षेत्रीय समीकरण कांग्रेस की राह में चट्टान बन कर खड़े हैं, जिनका हल मतदान से पहले उसे ढू़ंढना है। यह चुनाव घटक दलों के साथ ही साथ कांग्रेस के लिए काफी अहम है। इन चुनावों के परिणाम सीधे केंद्र की राजनीति को प्रभावित करेंगे। यदि बंगाल और तमिलनाडु में उसके सहयोगी दलों को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती है तो वह अपनी विफलता का ठीकरा कांग्रेस के माथे फोड़ेंगे क्योंकि केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार में लिप्त होने तथा महंगाई रोकने में विफलता के कारण घटक दल पहले ही अपने गुस्से का इजहार कर चुके हैं। ममता बनर्जी ने तो कलकत्ता में महंगाई के सवाल पर अपने सरकार के खिलाफ ही हल्ला बोल दिया था। ऐसे में आगामी 13 मई को इन राज्यों के आने वाले परिणाम केंद्र की गठबंधन की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं, इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए कांग्रेस के लिए यह कठिन अग्निपरीक्षा है तो उसके घटकदलों के लिए अस्तित्व की निर्णायक लड़ाई है। कहना न होगा कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव-परिणाम केंद्र की राजनीति को प्रभावित करेंगे। यदि बंगाल और तमिलनाडु में सहयोगी दलों को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती है तो वे विफलता का ठीकरा कांग्रेस के माथे फोड़ेंगे। भ्रष्टाचार तथा महंगाई रोकने में केंद्र की विफलता के कारण घटक दल पहले ही गुस्से का इजहार कर चुके हैं। 13 मई को इन राज्यों के आने वाले परिणाम कें द्र की गठबंधन की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं, इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए कांग्रेस के लिए यह कठिन अग्निपरीक्षा है तो उसके घटक दलोंिवशेष रूप से तृणमूल कांग्रेस के लिए अस्तित्व की निर्णायक लड़ाई है


Saturday, February 26, 2011

उम्मीद रखें, उजले दिन आएंगे


गोधरा कांड का फैसला आने के बाद से दोनों समुदायों में जिस किस्म का धैर्य और विनम्रता दिखी, उसकी तारीफ किए बगैर आप रह नहीं सकते। यह सामाजिक समरसता की बे जोड़ मिसाल है। उनके इस आचरण से धर्म के ठेकेदार सहम उठे हैं तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सक्रिय ताकतों के हौसले भी पस्त हुए हैं। फैसले पर उनकी सधी प्रतिक्रिया इसी का सबू त है। गोधरा से लेकर गुजरात दंगे के प्रमुख नौ मामलों में कानूनी कार्यवाही उच्चतम न्यायालय की निगरानी में चल रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अन्य मामलों में आने वाले फै सलों से सच और उजागर होगा
डायरी के पन्ने फड़फड़ा रहे हैं। नौ साल पहले गुजरात के गोधरा में जो हुआ, उस पर न्यायालय का फैसला आ चुका है। अदालत ने भी मान लिया है कि दिल दहलाने और हाड़ कंपा देने वाली यह वारदात यूं ही नहीं हुई। बाकायदा इसकी व्यूह रचना की गई थी। यह सौ फीसद साजिश थी। अभी तक इस घटना को लेकर खूब राजनीति होती रही। धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाले नेताओं ने इसकी आड़ में वोटों की फसल काटने का कोई भी जतन नहीं उठा रखा तो उधर मामले की जांच के लिए बना एक आयोग भी शक के घेरे में आ गया। सवाल यह है कि क्या ऐसे संवेदनशील मामले पर राजनीति होनी चाहिए? हर अमन पसंद का जवाब होगा- नहीं।इसलिए अल्पसंख्यकों व बहुसंख्यकों को अपने बीच सक्रिय उन चरमपंथियों की पहचान करने का समय आ गया है जो भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं। यह हमारे समय की दुखद और भयावह हकीकत है कि इस लोमहर्षक घटना की प्रतिक्रिया में गुजरात में साम्प्रदायिक दंगा भड़का। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश के लिए यह कलंक है। साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगाये जाने को महज दुर्घटना करार देने वालों को अपने बयान पर नये सिरे से सोचना जरूर चाहिए क्योंकि जो 59 कारसेवक इस आगजनी की भेंट चढ़े, वे कारसेवक बाद में और इंसान पहले थे। इससे पहले ऐसी किसी वारदात की मिसाल गुजरात में नहीं मिलती। इसके साथ घिनौनी राजनीति का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह अभी तक नहीं थमा है। लेकिन इस आंधी-पानी के बावजूद फैसला आने के बाद से दोनों समुदायों में जिस किस्म का धैर्य और विनम्रता दिखी, उसकी तारीफ किए बगैर आप रह नहीं सकते। यह सामाजिक समरसता की बेजोड़ मिसाल है। उनके इस आचरण से धर्म के ठेकेदार सहम उठे हैं तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सक्रिय ताकतों के हौसले भी पस्त हो गये हैं। इस फैसले पर उनकी सधी प्रतिक्रिया इसी का सबूत है। गोधरा से लेकर गुजरात दंगे के प्रमुख नौ मामलों में कानूनी कार्यवाही उच्चतम न्यायालय की निगरानी में चल रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अन्य मामलों में आने वाले फैसलों से सच और उजागर होगा। तेजी से रंग बदलते सामाजिक बदलाव के इस क्रम में इन मामलों को लेकर हुई राजनीति पर नजर डालना अब जरूरी हो गया है ताकि कोई चरमपंथी या सियासी ताकत हमारी सामाजिक समरसता बिगाड़ न सके। मैं यहां गोधरा कांड को लेकर बने आयोगों की रिपोर्ट पर पाठकों का ध्यान दिलाना चाहता हूं और न्यायालय के फैसले के कुछ बिंदुओं को सामने रखकर फैसला आप पर छोड़ता हूं। गोधरा कांड पर बने दो आयोगों की रिपोर्ट परस्पर विरोधी थीं। जीटी नानावती आयोग का गठन नरेंद्र मोदी सरकार ने किया तो यूसी बनर्जी आयोग का तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने। बनर्जी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह मानने से मना कर दिया कि साबरमती एक्सप्रेस के कोच को जलाने के पीछे कोई बदनीयत थी। आयोग ने कहा कि यह जानबूझ कर अंजाम दी गई घटना नहीं थी और न कोईषड्यंत्रथा। रिपोर्ट में पुलिस की पेट्रोल परिकल्पना को नकारते हुए कहा गया कि जब ट्रेन रुकी नहीं तो कोच के फर्श पर साठ लीटर पेट्रोल व अन्य ज्वलनशील पदार्थ डालना संभव नहीं था। यह आकस्मिक आग थी। कार सेवकों ने ट्रेन में खाना पकाया, इसके प्रमाण हैं। यह भी कि नारियल की घास, फोम और बर्थो में लगी रबड़ ने आग पकड़ी। इसके विपरीत नानावती आयोग ने इस नरसंहार को पूर्व नियोजित षड्यंत्र माना और कहा कि कोच जलाने की घटना जानबूझ कर की गई क्योंकि उसी कोच में कारसेवक यात्रा कर रहे थे। गुजरात पुलिस ने भी इसका समर्थन किया। इतना ही नहीं, इसकी साजिश रज्जाक कुरकुद, सलीम पानवाला और अन्य लोगों ने रची। कोच को बाहर से पेट्रोल छिड़ककर आग लगाई गई। यह कार्रवाई प्रशासन को अव्यवस्थित करने और आतंक फैलाने के लिए मकसद से की गई किंतु अब न्यायालय ने भी अपने फैसले में इसे षड्यंत्र मान लिया है। यह गुजरात पुलिस के लिए बड़ी जीत है क्योंकि विशेष जांच दल (एसआईटी) के आरोप पत्र में वर्णित घटनाक्रम को अदालत ने लगभग स्वीकार कर लिया है। इसमें अमन गेस्ट हाउस में साजिश रचने की बैठक से लेकर वहीं पेट्रोल रखने और कपड़ों के गट्ठर में आग लगाकर अंदर फेंकने की बात शामिल थी। जांच दल ने जिसे मुख्य अभियुक्त माना, न्यायालय ने भी उसी पर मुहर लगा दी है और उसे पांच मुख्य साजिशकर्ताओं में मान लिया। अदालत ने पेट्रोल का छिड़काव तथा कपड़ों के गट्ठर में आग लगाकर अंदर फेंकने की बात भी स्वीकार कर ली है। राज्य फोरेंसिक विज्ञान निदेशालय ने भी कोच जलाने के लिए पेट्रोल के प्रयोग की बात मानी है। न्यायालय ने 253 गवाहों के बयान, दस्तावेजी सबूतों तथा आठ अभियुक्तों के कन्फेशन के आधार पर यह फैसला दिया है। अब तथाकथित उन धर्मनिरपेक्ष ताकतों को सोचना चाहिए जो इस क्रूर साजिश को महज हादसा मान गंदी राजनीति कर रहे थे। मेरा मानना है कि बनर्जी आयोग का गठन भी राजनीति का ही एक हिस्सा था। तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद ने बिहार के चुनाव में इस रिपोर्ट का प्रचार कर वोट बटोरने की राजनीति की थी। यह बात जरूर है कि उनका यह दांव नहीं चला। अयोध्या, गोधरा और गुजरात दंगों को लेकर आज भी राजनीति हो रही है। इन दोनों समुदायों के स्वयंभू ठेकेदार ऐसी घटनाओं को जिंदा रखना चाहते हैं ताकि उनकी दुकान चलती रहे और समुदायों की गोलबंदी में कहीं से भी कोई सेंधमारी न हो। उनकी दिलचस्पी इस बात में हरगिज नहीं है कि विवाद सुलझे और दोनों पक्ष अमन से रहें। इसके ठीक उलट उनकी मंशा यह है कि नफरत की आग जलती रहे, चाहे वह गोधरा हो या कोई और घटना। यह आग बुझी तो उनकी सियासत बुझ जाएगी और दुकान पर ताला लग जाएगा। इसलिए ऐसे लोगों की पहचान जरूरी हो गई है क्योंकि यह देश के विकास की राह में सबसे बड़े बाधक हैं। वह नहीं चाहते कि उनकी कौम तरक्की करे। उन्हें भय है कि यदि ऐसा हुआ तो उनका वजूद समाप्त हो जाएगा। यहां दारूल उलूम के कुलपति मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी के उस बयान का जिक्र जरूरी है जिस पर इन दिनों तूफान मचा हुआ है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि गुजरात सरकार अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों में भेदभाव नहीं कर रही है। गुजरात दंगों का मुद्दा वर्षो पुराना है और अब हमें आगे की तरफ देखना चाहिए।वस्तानवी पर सितम टूट पड़ा कि वर्षो पूर्व लाशें बिछाने वाले की सरकार को उन्होंने अच्छा कैसे कह दिया? हालांकि बाद में वह एक सधे हुए राजनीतिज्ञ की तरह यह कहते हुए अपने बयान से मुकर गये कि मेरे साक्षात्कार को तोड़ मरोड़कर पेश किया गया। दरअसल इस हंगामे के पीछे भी राजनीति है। इससे पहले दारूम-उलूम पर हिंदी भाषियों का वर्चस्व रहा। जाहिर है, उत्तर प्रदेश की राजनीतिक लड़ाई और वोट बैंक की राजनीति यहां भी घुस आई और वस्तानवी को इस लड़ाई में अग्नि परीक्षा देनी पड़ रही है। यह प्रगतिशील मुसलमानों के लिए विचारणीय सवाल है। गुजरात आज विकास कर रहा है तो उसे स्वीकारने से दंगे का कलंक उसके माथे से मिट नहीं जाता। इसलिए, विकास की तारीफ करना कोई अपराध नहीं है। योजना आयोग ने भी वहां के विकास दर की तारीफ की है। विश्व बैंक भी वहां की तारीफ कर चुका है। यदि वस्तानवी ने इस सच्चाई का बखान कर दिया तो हंगामा क्यों? वामदल मुसलमानों के सबसे बड़े हितैषी बनते हैं लेकिन उन्हीं के शासन वाले पश्चिम बंगाल को सच्चर समिति ने अल्प संख्यकों के विकास के मामले में सबसे पीछे माना है। उत्तर प्रदेश और बिहार में मुसलमानों की शैक्षिक और माली हालत किसी से छुपी नहीं है। आसन्न चुनावों में मुस्लिम वोट के लिए ही दलित से मुस्लिम और ईसाई बने लोगों को आरक्षण देने पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमेटी में निर्णय इसलिए नहीं हो सका क्योंकि ममता बनर्जी चाहती थीं कि पूरे मुस्लिम समुदाय को आरक्षण दिया जाए। यह मामला अब उलझकर रह गया है। सवाल यह है कि मुसलमान कब तक दकियानूसी ताकतों और चरमपंथियों के चंगुल में फंसा रहेगा। आज जरूरत इससे बाहर निकलने और सोच बदलने की है। तभी आम मुसलमान प्रगति कर सकता है। दुखद यह है कि मुस्लिम वोटों के सौदागर और कुछ तथाकथित संगठन ही उनकी राह में सबसे बड़े अवरोध हैं। उनकी सोच का परिणाम है कि गोधरा पर फैसला आने के बाद उनकी सबसे ज्यादा सहानुभूति रिहा हुए लोगों के प्रति दिखी जबकि रेल कोच में मारे गये कार सेवकों के प्रति उतनी नहीं। वस्तुत: यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण और बेहद शर्मनाक है और जरूरत इसी को बदलने की है।


Thursday, February 3, 2011

नये राज्यों के गठन के तर्क


निजाम और चारमीनार के शहर के बतौर पहचाना जाने वाला और बदलते समय के साथ देश के आईटी हब के रूप में प्रतिष्ठापित हैदराबाद आजादी के लगभग छह दशक बाद फिर केंद्र सरकार के लिए परेशानी का सबब बन गया है। सर्वविदित है कि केंद्र और आंध्रप्रदेश सरकार की अग्नि परीक्षा का सबब बनी तेलंगाना मसले पर कायम जिच हैदराबाद को लेकर ही नहीं सुलझ पा रही है। हालांकि यदि किसी तरह सरकार तेलंगाना के मसले से पार पाने में सफल रही भी तो उसे राहत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि देश के विविध प्रांतों में नए राज्यों की मांग को लेकर संघर्षरत व्यक्तियों-संगठनों की निगाहें इसी पर टिकी हैं कि सरकार तेलंगाना के प्रश्न पर क्या निर्णय लेती है। फिलहाल देश में लगभग आधा दर्जन नए राज्यों की मांग को लेकर लोग मुखर हैं। इसके पीछे विकास में पिछड़ेपन को प्रमुख आधार बनाया जा रहा है। कुछेक नेताओं की सत्ताकांक्षा भी इसके पीछे अहम कारक बन रही है। लेकिन निरपेक्ष आकलन करने पर इन मांगों का प्रमुख कारक शासन की खराब गुणवत्ता ही लगती है और धीरे-धीरे हालात ऐसे बन गए हैं कि लोग इस मर्ज का इलाज पृथक राज्यों के रूप में देखने लगे हैं। तेलंगाना आंदोलन का इतिहास लगभग आजाद भारत के इतिहास जितना ही पुराना है। जब आंध्रप्रदेश अस्तित्व में आया तो तेलंगाना के लोगों से बाकायदा समझौता कर तमाम वादे किए गए। लेकिन समय के साथ उन्हें भुला दिया गया। नतीजा तेलंगाना के लिए कभी मुखर तो कभी मद्धम स्वर में आवाज उठती रही। आज तेलंगानावासियों की शिकायत है कि उनके क्षेत्र में सिचाई, बिजली, उद्योग आदि आधारभूत संरचनाओं के विकास की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। यह सीधे तौर पर शासन की खराब गुणवत्ता के चलते उपजी समस्या है। जाने-अनजाने इसी के चलते तेलंगाना के लोगों में अहसास उभरा कि उनकी अनदेखी हो रही है। परिणामस्वरूप लोग पृथक राज्य से कम पर मानने को तैयार नहीं हैं। यह सही है कि लोगों की इस भावना का प्रतिनिधित्व करने के बदले केसीआर जैसे नेताओं की नजरें अपनी सियासी आकांक्षा पूरी करने पर टिकी हैं। यदि ऐसा न होता तो केसीआर को तेलंगाना की याद तब न आती जब तेलगूदेशम के आंतरिक समीकरणों के चलते उनके चंद्रबाबू नायडू से मतभेद हुए। देश के कई अन्य हिस्सों में भी अलग राज्य की मांग सिर उठा रही है। और कई कसौटियों पर यह जायज भी जान पड़ती हैं। विदर्भ इसका बड़ा उदाहरण है। विकसित सूबे के तौर पर शुमार महाराष्ट्र का यह इलाका बीते सालों में किसानों की कब्रगाह के तौर पर पहचाना जाने लगा है। कपास की सालोंसाल खराब होती फसल और कर्ज के चक्रव्यूह में फंसे किसान हताशा में आत्महंता बनते जा रहे हैं। सरकार के पैकेज ऊंट के मुंह में जीरे से अधिक नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्वाचल में भी हालात अलग नहीं हैं। 1857 से लेकर स्वतंत्रता मिलने तक आजादी के आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाले वाला यह क्षेत्र बुनकरों-कालीन उद्योग की बदहाली, चीनी मिलों की बंदी और रोजगार की तलाश में विस्थापन के लिए जाना जाता है। दो दर्जन से अधिक लोकसभा और लगभग 150 विधानसभा सीटों को समेटे यह अंचल स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और बिजली सहित सभी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। राज्य का एक अन्य हिस्सा बुंदेलखंड भी इसी दर्द का शिकार है। बीते सालों में मानसून और सरकारों की बेरुखी ने यहां के हालात इतने खराब कर दिए हैं कि विदर्भ की तरह ही यहां के किसान भी मुक्ति का मार्ग आत्महत्या में तलाशने लगे हैं। यूपी के पश्चिमी अंचल में हरित प्रदेश नाम के अलग राज्य की मांग भी बहुत दिनों से की जा रही है। हालांकि यह इलाका अन्य क्षेत्रों की तुलना में विकसित व संपन्न है लेकिन यहां के लोग प्रशासनिक कें द्र के रूप में लखनऊ को बहुत दूर महसूस करते हैं। इस क्रम में गोरखालैंड का जिक्र भी जरूरी है। यहां के लोग शेष पश्चिम बंगाल से भौगोलिक बनावट, विकास और संस्कृति के स्तर पर कदमताल नहीं कर पाते। विकास का नव-उदारवादी मॉडल अपनाए जाने के बाद विदर्भ, पूर्वाचल और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों की मुश्किलें और बढ़ी हैं। सरकार द्वारा निवेश का जिम्मा प्रमुखतया निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया गया है, जो मुनाफे को इसकी आवश्यक शर्त मानता है। इसका नतीजा यह कि कुछेक शहर- क्षेत्र समृद्धि के द्वीप बनते जा रहे हैं और पिछड़े इलाके दरिद्र होते जा रहे हैं। लेकिन आंकड़ों की बाजीगरी में सचाई छुप जा रही है। मुंबई-पुणो की अमीरी की आड़ में विदर्भ, लखनऊनोएडा की आड़ में पूर्वाचल तथा बुंदेलखंड और हैदराबाद की ओट में तेलंगाना की मुफलिसी ढकी जा रही है। इसलिए यदि सरकार सचाई से मुंह चुराने की बजाए जनसंख्या, पिछड़ेपन और भौगोलिक हकीकतों के आधार पर नए राज्यों के गठन पर गंभीरता से विचार करे तो इसमें कुछ गलत नहीं है। वैसे भी लगभग 16 करोड़ की आबादी को समेटे उत्तर प्रदेश जैसे राज्य का पुनर्गठन वक्त की जरूरत लगती है। लेकिन हालिया वक्त में इच्छाशक्ति और टालू रवैये के चलते सरकारें किसी मामले पर तब तक स्वत: पहल नहीं कर रहीं जब तक ऐसा करना मजबूरी न बन जाए। तेलंगाना प्रकरण तो इसका प्रमाण है ही, गुर्जर आरक्षण का मसला भी ज्वलंत उदाहरण है। बहरहाल, यदि सरकार नए राज्यों का गठन कर भी दे तो मात्र इतने से ही उनकी समस्याएं सुलझ जाएंगी, ऐसा सोचना बेमानी है। समस्या की असल जड़ हमारे शासन की खराब गुणवत्ता में निहित है। अलग अस्तित्व के बाद भी झारखंड जैसे राज्यों ने प्रशासनिक बेहतरी का कोई अच्छा उदाहरण अब तक प्रस्तुत नहीं किया है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश की आदर्शआर्थिक राजधानी मुंबई के एक तिहाई बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। दो सरकारों की नाक के नीचे दिल्ली में भी गरीबी, बेकारी जैसी समस्याएं मौजूद हैं। ऐसे में राज्य पुनर्गठन के साथ सरकारी मशीनरी को अधिक जिम्मेदार, कुशल और जवाबदेह बनाने की जरूरत है।