पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का झंझावत उत्तर बंगाल से होते हुए अब जंगलमहल में प्रवेश कर रहा है। पांचवें चरण में नक्सल प्रभावित पश्चिमी मेदिनीपुर, बांकुड़ा, पुरुलिया जिलों तथा बर्द्धमान की 12 विधानसभा सीटों समेत 38 निर्वाचन क्षेत्रों में शनिवार को मतदान है। यह इलाका कभी वाममोर्चा का दुर्ग रहा है, लेकिन पिछले दो वर्षो में तेजी से बदले राजनीतिक हालात ने इस लाल दुर्ग को हिलाकर रख दिया है। तृणमूल अध्यक्ष ममता बनर्जी द्वारा दिए गए परिवर्तन के नारे के बाद वाम मोर्चा इस दुर्ग को बचाए रखने में कितना कामयाब होगा, यह चुनाव परिणाम बताएगा। माकपा को जंगलमहल में दो मोर्चे पर लड़ाई लड़ रही है। एक ओर जहां हाथों में बंदूक थामे माओवादी माकपाइयों पर हमले बोल रहे हैं, वहीं तृणमूल सुप्रीमो परिवर्तन का नारा देकर शब्दों की मिसाइल दाग रही हैं। ऐसे में बांकुड़ा, पुरुलिया, मेदिनीपुर और बर्द्धमान में लालदुर्ग को सलामत रखना माकपा नीत वाममोर्चा के लिए कठिन हो रहा है। इलाके में सीटों के परिसीमन से भी राजनीतिक समीकरण बिगड़ा है। कुछ नई सीटें जुड़ी हैं तो कुछ समाप्त हो गई है। ऐसे में सीटों पर कब्जा बरकरार रखने को लेकर वाममोर्चा नई चुनौतियों से दो-चार है। पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो पश्चिमी मेदिनीपुर जिले की जिन 12 सीटों पर शनिवार को मतदान होना है, उनमें 10 पर माकपा व उसके सहयोगी दलों का कब्जा रहा है। मात्र दो सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली थी। इसी प्रकार पुरुलिया में सभी पांच, बांकुड़ा की सभी नौ और बर्द्धमान की 12 सीटों में से 11 सीटों पर माकपा व सहयोगी दलों का कब्जा रहा है। जबकि एक सीट तृणमूल के पास थी। पिछले लोकसभा चुनाव से स्थितियां बदलीं। बावजूद इसके बांकुड़ा व पुरुलिया में लाल दुर्ग सलामत रहा। इसी को लेकर बुद्धदेव भट्टाचार्य और अन्य वामनेता संतुष्ट हैं कि इस दफा स्थितियां उनके अनुकूल रहेंगी। इस चरण में माकपा के दिग्गज व राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सूर्यकांत मिश्रा तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मानस भुइयां समेत 193 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। राज्य में कुल छह चरणों में मतदान होना है। 13 मई को मतगणना होगी।
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Saturday, May 7, 2011
Saturday, April 9, 2011
बंगाल ने दी जोट की राजनीति
स्वतंत्रता आंदोलन के प्रखर सिपाही गोपाल कृष्ण गोखले ने कभी सच ही कहा था, बंगाल जो आज सोचता है, शेष भारत कल और पूरा विश्व एक दिन बाद सोचता है। इसका सबसे सटीक उदाहरण गठजोड़ की राजनीति है, जिसने बंगाल में जन्म लिया और आज देश ही नहीं विश्र्व में कई राष्ट्रों की मजबूरी बन चुकी है। जब किसी ने गठबंधन राजनीति की कल्पना भी नहीं की थी तब आजादी के 20 वर्ष बाद ही 15 मार्च 1967 में बंगाल में प्रथम संयुक्त फ्रंट की सरकार गठित हुई थी। 1962 में बंगाल के तीसरे चुनाव में ही जोट की अवधारणा जन्म ले चुकी थी और कांग्रेस को बंगाल की सत्ता से हटाने के लिए युनाइटेड लेफ्ट इलेक्शन कमेटी और युनाइटेड लेफ्ट फ्रंट बना लिया गया था, जिसने कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा। इसमें कांग्रेस को 157 सीटों पर सफलता मिली वहीं संयुक्त मोर्चा को 75 सीटों पर सफलता मिली और मत प्रतिशत 33 रहा था। इसके बाद ही 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश में गठबंधन की सरकार बनी थी, जिसके मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह हुए थे। विधानचंद्र राय के समय ही पश्चिम बंगाल में कांग्रेस दो भागों में बंट चुकी थी। कांग्रेस से टूट कर नई पार्टी बंगाल कांग्रेस बनी थी, जिसके अगुआ अजय मुखर्जी हुए। इसके बाद कांग्रेस के खिलाफ दो अलग-अलग मोर्चा बना। 1967 में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव में संयुक्त वामफ्रंट को 63 सीटों पर जीत मिली और इतनी ही सीटों पर बंगाल कांग्रेस के नेतृत्व वाले पीपुल्स युनाइटेड फ्रंट को जीत मिली। दोनों फ्रंट के नेताओं ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया और फ्रंट की संयुक्त सरकार बनी। अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने। हालांकि, 1969 में दोनों फ्रंट के नेताओं के बीच मतभेद की वजह से मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गई। आगे 1971 में कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई और 1972 चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुत मिला, सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री बने। वे अंतिम कांग्रेसी मुख्यमंत्री साबित हुए।
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