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Wednesday, April 20, 2011

शिवसेना के लिए राजनीतिक जमीन बचाने का बहाना


शिवसेना जैतापुर में वही भूमिका निभाना चाहती है, जो कुछ वर्ष पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम-सिंगुर में तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने निभाई थी। वह जैतापुर में परमाणु ऊर्जा परियोजना विरोधी आंदोलन को हवा देकर कोकण में अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश भी कर रही है। मुंबई से गोवा के बीच की सागरतटीय पट्टी कोकण के नाम से जानी जाती है। लंबे समय से कोकण क्षेत्र पर शिवसेना का राजनीतिक प्रभुत्व रहा है। साढ़े चार वर्ष चली शिवसेना-भाजपा गठबंधन सरकार के दौरान शिवसेना के दोनों मुख्यमंत्री मनोहर जोशी एवं नारायण राणे कोकण क्षेत्र के ही थे। मुंबई निवासी मराठीभाषियों में भी बड़ी संख्या कोकण मूल के लोगों की है। कोकण पर शिवसेना के प्रभुत्व के कारण ही मुंबई महानगरपालिका पर भी शिवसेना का ही राज चलता आ रहा है। लेकिन कुछ वर्ष पहले नारायण राणे द्वारा शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो जाने के बाद कोकण में शिवसेना का प्रभाव घटकर आधा हो गया है । कोकण में कम हुए प्रभाव का दुष्परिणाम निकट भविष्य में शिवसेना को मुंबई महानगरपालिका चुनाव में भी देखना पड़ सकता है। इसलिए शिवसेना कोकण में अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने केलिए जैतापुर परियोजना के विरोध का सहारा ले रही है। कोकण के जिस क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु ऊर्जा परियोजना प्रस्तावित है, संसद में उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नारायण राणे के पुत्र नितेश राणे करते हैं। नारायण राणे स्वयं भी महाराष्ट्र सरकार के उद्योग मंत्री है और कांग्रेस की नीति के अनुसार ही वह जैतापुर परियोजना का समर्थन कर रहे हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण की जैतापुर यात्रा के दौरान भी राणे उनके साथ थे। उन्हें जैतापुर में परियोजना विरोधियों के गुस्से का शिकार होना पड़ा था। राणे शिवसेना से निकले हुए पहले ऐसे नेता हैं, जो शिवसेना से निकलने के बावजूद अपने क्षेत्र से न सिर्फ स्वयं चुनकर आए, बल्कि अपने कई समर्थकों को भी चुनवाकर लाने में सफल रहे। शिवसेना के सुरेश प्रभु को हराकर अपने पुत्र को सांसद बनाने में भी वह सफल रहे। राणे द्वारा हथियाई गई यही राजनीतिक जमीन शिवसेना को खटक रही है। वह जैतापुर विरोधी आंदोलनकारियों को समर्थन देकर उस क्षेत्र में पुन: अपना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना चाहती है ।